हिमाचल हाईकोर्ट की सरकार को फटकार, अदालती आदेश पालन के लिए 3 हफ्ते की मोहलत
जोगिंद्र कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने आदेश का अनुपालन न करने पर नाराजगी जताई और राज्य सरकार पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया।
आदेश पालन में देरी पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 3 हफ्ते की मोहलत दी और 10 हजार जुर्माना लगाया।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालती आदेशों के पालन में देरी और उनके क्रियान्वयन को लेकर टालमटोल करने पर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने सरकार को मूल फैसले का पूरी तरह पालन करने के लिए तीन हफ्ते का आखिरी मौका दिया है। साथ ही याचिकाकर्ता को 10 हजार रुपये की हर्जाना राशि देने का आदेश दिया है। अदालत ने यह निर्देश जोगिंद्र कुमार की ओर से दायर निष्पादन याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी।
याचिकाकर्ता जोगिंद्र कुमार मूल रूप से ओम प्रकाश बनाम हिमाचल राज्य मामले में शामिल थे। इस मामले में हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2023 को निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ताओं को 1 अक्तूबर 2012 से मुख्य शिक्षक के पद पर पदोन्नति वेतन वृद्धि (प्रोमोशनल इंक्रीमेंट) दी जाए। अदालत ने इस प्रक्रिया को छह सप्ताह के भीतर पूरा करने का आदेश दिया था।
इसके बाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में ही राज्य सरकार को अनुपालन हलफनामा या जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। हालांकि, एक साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद सरकार की ओर से कोई आधिकारिक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। आदेश के अनुपालन में हुई इस देरी पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया।
सुनवाई के दौरान राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक (कांगड़ा) का एक आदेश अदालत के समक्ष पेश किया। इसमें बताया गया कि विभाग ने याचिकाकर्ता के मामले की समीक्षा सूर्या प्रभा बनाम हिमाचल राज्य नामक एक अन्य मामले के संदर्भ में की थी।
इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब याचिकाकर्ता के पक्ष में सीधा और स्पष्ट फैसला सुनाया जा चुका था, तो विभाग को उस फैसले की दोबारा समीक्षा करने या उसे किसी अन्य मामले से जोड़ने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि विभाग की जिम्मेदारी न्यायालय के फैसले का पालन करना है, न कि उस पर पुनर्विचार करना।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह बिना किसी बहानेबाजी के मूल फैसले के अनुरूप तत्काल आवश्यक कदम उठाए और आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करे। तीन सप्ताह की अंतिम समय-सीमा और 10 हजार रुपये की हर्जाना राशि का आदेश न्यायालय के निर्देशों के पालन में हो रही देरी पर अदालत की सख्ती को दर्शाता है।