श्रीनगर: कश्मीर की वादी में साल के उस सबसे कठिन दौर का आगाज़ हो चुका है, जिसे सुनते ही रूह कांप उठती है। 'चिल्लई कलां'—40 दिनों की वह भीषण अवधि, जहाँ प्रकृति अपनी सबसे कठोर परीक्षा लेती है। इस समय पूरी घाटी एक सफेद बर्फ की चादर में कैद हो चुकी है और पारा इतना गिर चुका है कि नसों में बहता खून भी जमने की कगार पर है। श्रीनगर से लेकर गुलमर्ग तक, हर तरफ सन्नाटा और बर्फ की हुकूमत है। यह केवल एक मौसम नहीं, बल्कि कश्मीरियों के साहस और कुदरत के सितम के बीच के संघर्ष की एक महागाथा है, जिसने इस बार अपने शुरुआती दिनों में ही जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।

इस बार चिल्लई कलां का कहर इतना तीव्र है कि डल झील का पानी पत्थर की तरह सख्त हो गया है। स्थानीय निवासी मोहम्मद सुल्तान, जो बरसों से शिकारा चलाकर अपना गुजारा करते हैं, बताते हैं कि उन्होंने लंबे समय बाद ऐसी भीषण ठंड देखी है जहाँ सुबह नाव चलाना नामुमकिन हो गया है। वहीं, उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के रहने वाले बशीर अहमद का कहना है कि नलों में पानी जम जाने के कारण पीने के पानी की भारी किल्लत हो गई है और लोग बर्फ पिघलाकर अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं। वादी के तापमान में आई इस भारी गिरावट ने न केवल यातायात को बाधित किया है, बल्कि बिजली की आपूर्ति को भी पूरी तरह चरमरा दिया है।

प्रशासनिक स्तर पर इस चुनौती से निपटने के लिए कश्मीर के संभागीय आयुक्त विजय कुमार बिधूड़ी ने सभी विभागों को हाई अलर्ट पर रखा है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि राजमार्गों से बर्फ हटाने के काम में किसी भी प्रकार की कोताही न बरती जाए। स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. मुश्ताक अहमद राथर ने भी घाटी के अस्पतालों में अतिरिक्त हीटिंग सुविधाओं और जीवन रक्षक दवाओं का स्टॉक सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं, ताकि बुजुर्गों और बच्चों को सांस संबंधी समस्याओं से बचाया जा सके। पर्यटन विभाग के अधिकारी राजा याकूब ने बताया कि जहाँ एक तरफ यह ठंड स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बनी हुई है, वहीं गुलमर्ग और पहलगाम में सैलानियों की भारी भीड़ इस 'बर्फानी जन्नत' का अनुभव करने पहुँच रही है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक उम्मीद की किरण है।

जैसे-जैसे सूरज ढलता है, कश्मीर की गलियों में 'कांगड़ी' (कोयले की अंगीठी) ही एकमात्र सहारा बचती है। दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड और पहलगाम जैसे इलाकों में रात का तापमान शून्य से 8 से 10 डिग्री नीचे चला गया है। मौसम विज्ञान केंद्र श्रीनगर के निदेशक मुख्तार अहमद ने चेतावनी जारी की है कि आने वाले दिनों में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के कारण भारी बर्फबारी की संभावना है, जो चिल्लई कलां के इस प्रकोप को और अधिक गंभीर बना सकती है। सड़कों पर जमी बर्फ की फिसलन के कारण यातायात विभाग के अधिकारी महेश कुमार ने चालकों को अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है।

चिल्लई कलां का यह दौर केवल हाड़ कंपा देने वाली ठंड का नाम नहीं है, बल्कि यह कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान और जीवटता का भी प्रतीक है। जब दुनिया नए साल के जश्न की तैयारी करती है, तब कश्मीर का हर शख्स इस भीषण सर्दी से अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहा होता है। यह 40 दिन की अवधि यह याद दिलाती है कि प्रकृति के सामने इंसान कितना छोटा है, फिर भी 'फेरन' और 'कांगड़ी' के दम पर कश्मीर हर साल इस मौत जैसी ठंड को मात देकर बसंत का स्वागत करता है। इस बार का सितम भले ही गहरा हो, लेकिन वादी की उम्मीदें अभी भी बर्फ के नीचे दबी उस गर्माहट की तलाश में हैं जो आने वाले कल को रोशन करेगी।

Pratahkal Hub

Pratahkal Hub

प्रातःकाल हब, दै.प्रातःकाल की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा प्रातःकाल हब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।"

Next Story