प्रचंड गर्मी की दस्तक और सूखते जलाशय: सुपर अलनीनो के साये में भारत

भारत के लिए आगामी ग्रीष्मकाल एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है क्योंकि देश के प्रमुख जल स्रोतों में जलस्तर चिंताजनक रूप से गिरकर अपनी कुल क्षमता के आधे से भी कम रह गया है। मौसम विज्ञानियों और जल विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्ट्स ने एक साथ कई खतरे की घंटियां बजा दी हैं। एक ओर जहां धरती 'सुपर अलनीनो' के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है, वहीं दूसरी ओर देश की जीवनदायिनी नदियों और जलाशयों का सूखना आने वाले समय में भीषण जल संकट और खाद्यान्न सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने भी अलनीनो के चलते मानसून के कमजोर रहने की आशंका व्यक्त की है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में 'सुपर अलनीनो' एक ऐसी असाधारण घटना है जो प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। यूरोपीयन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) के नवीनतम आंकड़े संकेत देते हैं कि जून तक यह प्रभाव अपने चरम पर होगा। पूर्व में 1997-98 और 2015-16 के दौरान दुनिया ने इस घटना के विनाशकारी परिणाम देखे हैं, जिसमें वैश्विक तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। भारत के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ है कि मई और जून के महीनों में न केवल तापमान सामान्य से कहीं अधिक रहेगा, बल्कि लू (Heatwave) के थपेड़े जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देंगे।

केंद्रीय जल आयोग (CWC) की 9 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट देश की वर्तमान स्थिति का एक डरावना खाका खींचती है। आयोग द्वारा निगरानी किए जा रहे 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार घटकर मात्र 44.71 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट फरवरी के बाद से अत्यंत तीव्र हुई है। फरवरी के पहले सप्ताह में जहां भंडारण 66.63 प्रतिशत था, वहीं अप्रैल आते-आते यह घटकर आधे से भी नीचे चला गया। बिहार का चंदन बांध तो पूरी तरह सूख चुका है, जो स्थानीय कृषि और पेयजल के लिए एक बड़ा झटका है। इसके अतिरिक्त असम, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के कई महत्वपूर्ण जलाशयों में जल स्तर 16 से 42 प्रतिशत के बीच सिमट गया है।

नदियों के बेसिन पर नजर डालें तो गंगा, नर्मदा, गोदावरी और कृष्णा जैसी प्रमुख नदियों पर बोझ बढ़ गया है। गंगा में अपनी क्षमता का मात्र 53.8 प्रतिशत, जबकि कृष्णा में केवल 31.31 प्रतिशत पानी शेष है। कावेरी और नर्मदा की स्थिति भी इससे बेहतर नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनवरी और फरवरी में कम बारिश होने के कारण जलाशयों की भरपाई नहीं हो पाई, जिससे गर्मी की शुरुआत में ही जल संकट गहरा गया है। यदि मानसून में देरी होती है या बारिश सामान्य से कम रहती है, तो देश के बड़े हिस्से को सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

सुपर अलनीनो का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वायुमंडलीय चक्र को पूरी तरह प्रभावित करता है। दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर बहने वाली मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे दक्षिण एशिया में वर्षा की मात्रा घट जाती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर संकट की स्थिति है। सरकार और संबंधित विभागों के लिए अब चुनौती यह है कि वे उपलब्ध जल संसाधनों का प्रबंधन कैसे करते हैं और आने वाली भीषण गर्मी से नागरिकों को राहत दिलाने के लिए क्या आपातकालीन योजनाएं क्रियान्वित करते हैं। यह समय केवल चेतावनी का नहीं, बल्कि जल संरक्षण की दिशा में युद्धस्तर पर कार्य करने का है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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