कुदरत का महा-तांडव: आधा विश्व जल रहा, आधा जम रहा! क्या ला-नीना ने दे दी है किसी बड़ी तबाही की दस्तक?
दुनिया भर में चरम मौसम (Extreme Weather) का कहर जारी है। ला-नीना के असर से दक्षिणी गोलार्ध में भीषण गर्मी और दावानल, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका में ध्रुवीय भंवर (Polar Vortex) के कारण भारी बर्फबारी हो रही है। पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।

India could experience cold winter due to weak La Niña conditions
वाशिंगटन/जेनेवा, 10 मार्च 2026
आज पूरी दुनिया एक अजीबोगरीब मौसम चक्र के बीच खड़ी है। एक तरफ जहां उत्तरी गोलार्ध के देश हाड़ कंपा देने वाली ठंड और बर्फबारी से जूझ रहे हैं, वहीं दक्षिणी गोलार्ध के देशों में गर्मी ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, यह 'चरम मौसम' (Extreme Weather) वैश्विक जलवायु प्रणाली में आ रहे बड़े बदलावों और 'ला-नीना' (La Niña) के आखिरी चरण का नतीजा है।
दक्षिणी गोलार्ध: सूरज की तपिश और जंगलों की आग
ऑस्ट्रेलिया, चिली और अर्जेंटीना जैसे देशों में इस समय हालात बेहद चिंताजनक हैं। मार्च का महीना होने के बावजूद यहाँ पारा 45°C से 49°C के बीच दर्ज किया जा रहा है।
- ऑस्ट्रेलिया: दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के सिडुना (Ceduna) जैसे शहरों में तापमान 49.5°C तक पहुंच गया है। भीषण गर्मी के कारण जंगलों में आग (Wildfires) लगने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिससे वन्यजीवों और पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
- दक्षिण अमेरिका: चिली और अर्जेंटीना के पेटागोनिया क्षेत्र में भीषण सूखे और गर्मी के कारण 'स्टेट ऑफ कैटास्ट्रॉफी' (State of Catastrophe) घोषित कर दी गई है। हज़ारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं क्योंकि जंगलों की आग बस्तियों तक पहुंच रही है।
यूरोप और उत्तरी अमेरिका: ध्रुवीय भंवर (Polar Vortex) का हमला
मैदानी इलाकों की गर्मी के ठीक विपरीत, उत्तरी गोलार्ध में ठंड का कहर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 'पोलर वर्टेक्स' (Polar Vortex) यानी ध्रुवीय भंवर के टूटने के कारण आर्कटिक की ठंडी हवाएं नीचे की ओर आ गई हैं।
- यूरोप: नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और रूस के उत्तरी हिस्सों में भारी बर्फबारी के कारण जनजीवन ठप है। तापमान -20°C से नीचे गिर गया है, जिससे यातायात और बिजली आपूर्ति बाधित हुई है।
- अमेरिका और कनाडा: अमेरिका के मिडवेस्ट और उत्तर-पूर्वी राज्यों में शीत लहर का प्रकोप है। मिशिगन और न्यूयॉर्क जैसे इलाकों में मार्च में भी भारी बर्फबारी हो रही है, जिसे विशेषज्ञ 'देर से आई सर्दियों का हमला' कह रहे हैं।
ला-नीना (La Niña) और 'रिलायबल इंस्टेबिलिटी'
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल का मौसम 'रिलायबल इंस्टेबिलिटी' (विश्वसनीय अस्थिरता) के दौर से गुजर रहा है। प्रशांत महासागर में जारी 'ला-नीना' का प्रभाव अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और 'एल-नीनो' (El Niño) की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जब ये दो बड़ी समुद्री घटनाएं आपस में टकराती हैं या बदलती हैं, तो पूरी दुनिया के वायुमंडल में हलचल मच जाती है। इसी कारण मोजाम्बिक और दक्षिण अफ्रीका के कुछ हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ देखी गई है, जहाँ कुछ ही दिनों में पूरे साल भर की बारिश हो गई।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: क्या यह 'न्यू नॉर्मल' है?
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि ये घटनाएं अब अपवाद नहीं बल्कि नियम बनती जा रही हैं। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Human-induced Climate Change) ने प्राकृतिक चक्रों को इतना प्रभावित कर दिया है कि मौसम की भविष्यवाणी करना कठिन होता जा रहा है।
- समुद्र का बढ़ता तापमान: समुद्र के गर्म होने से तूफानों को अधिक ऊर्जा मिल रही है।
- जेट स्ट्रीम में बदलाव: ठंडी और गर्म हवाओं को नियंत्रित करने वाली जेट स्ट्रीम अब अपनी जगह बदल रही है, जिससे बिन मौसम बरसात और हीटवेव की घटनाएं बढ़ रही हैं।
10 मार्च 2026 की यह अंतरराष्ट्रीय मौसम रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के पास सीमाओं का कोई बंधन नहीं है। यदि ऑस्ट्रेलिया तप रहा है, तो उसका असर भविष्य में वैश्विक खाद्य आपूर्ति और समुद्र के स्तर पर भी पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल भविष्यवाणियों पर नहीं, बल्कि जलवायु के प्रति 'अनुकूलन' (Adaptation) पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
