भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर मौसम विभाग ने बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाले पूर्वानुमान जारी किए हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, इस वर्ष देश के मौसम तंत्र में एक बड़ा और भयावह असंतुलन देखने को मिल सकता है। प्रशांत महासागर में तेजी से आकार ले रहा शक्तिशाली अल नीनो भारतीय मानसून की हवाओं को कमजोर कर रहा है, जिससे देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में आ सकता है, जबकि तटीय क्षेत्रों पर जलप्रलय का खतरा मंडरा रहा है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल मानसूनी बारिश अपने दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का केवल 92 फीसदी रहने की संभावना है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में सामान्य से कम बारिश की श्रेणी में रखा जाता है। वर्ष 1971 से 2020 के बीच के ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर भारत में औसत मानसूनी बारिश 870 मिलीमीटर होनी चाहिए, लेकिन इस बार इसके काफी नीचे रहने की आशंका जताई गई है। आईएमडी के सांख्यिकीय मॉडल दर्शाते हैं कि इस वर्ष देश में गंभीर सूखे की स्थिति बनने की संभावना 35 प्रतिशत तक है, जो कि सामान्य वर्षों की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। जून या जुलाई के महीनों में अल नीनो के पूरी तरह सक्रिय होने की उम्मीद है, जो इस स्थिति को और अधिक विकट बना सकता है।

इस मौसमी बदलाव का सबसे घातक असर उत्तर और मध्य भारत के कृषि प्रधान क्षेत्रों पर पड़ने की आशंका है। विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों में मानसूनी बारिश की भारी कमी देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त, दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों को भीषण गर्मी और जल संकट के दोहरे मोर्चे पर एक साथ संघर्ष करना पड़ सकता है। मानसून पर देश की लगभग आधी आबादी और कुल वार्षिक वर्षा का 70 प्रतिशत हिस्सा निर्भर करता है। ऐसे में बारिश की कमी सीधे तौर पर फसलों के उत्पादन को प्रभावित करेगी, जिससे ग्रामीण आय में गिरावट, खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी और बिजली आपूर्ति पर भारी दबाव उत्पन्न होना तय माना जा रहा है।

इसके विपरीत, दक्षिण भारत के तटीय राज्यों जैसे तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में स्थिति बिल्कुल उलट और विनाशकारी हो सकती है। इन क्षेत्रों में अल नीनो के प्रभाव के कारण अत्यधिक और अनियंत्रित मानसूनी गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं, जिससे तटीय इलाकों में भीषण और तबाही मचाने वाली बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि, इस भौगोलिक संकट के बीच मौसम विभाग ने यह भी बताया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार अपनी सामान्य तिथि से लगभग चार दिन पहले, यानी 26 मई के आसपास ही केरल के तट पर दस्तक दे सकता है। वर्तमान में यह अंडमान सागर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और दक्षिण बंगाल की खाड़ी के हिस्सों में अनुकूल परिस्थितियों के साथ आगे बढ़ रहा है।

इस भीषण संकट के बीच मौसम वैज्ञानिकों ने 'इंडियन ओशन डिपोल' (आईओडी) के रूप में उम्मीद की एक क्षीण किरण भी दिखाई है। जलवायु मॉडलों के विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि मानसून के उत्तरार्ध यानी आखिरी महीनों में आईओडी सकारात्मक रुख अपना सकता है। यदि यह परिस्थिति समय पर निर्मित होती है, तो यह प्रशांत महासागर के अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक संतुलित करने में सक्षम होगी, जिससे मानसूनी हवाओं को पुनः गति मिल सकती है और सूखे से प्रभावित कुछ क्षेत्रों में बारिश की वापसी संभव हो सकेगी।

बदलते वैश्विक परिवेश और देश की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए आईएमडी अब देश में लू (हीटवेव) घोषित करने के पारंपरिक मापदंडों में भी बड़े संशोधन की तैयारी कर रहा है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, वर्तमान मापदंड भारतीय क्षेत्रों की वास्तविक जमीनी स्थितियों और अत्यधिक उमस के स्तर को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। इस बार पहली बार कर्नाटक और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों के समीप एक अत्यंत दुर्लभ चक्रवाती तंत्र का निर्माण हुआ है, जिसके आधार पर मौसम विभाग को अपने पूर्वानुमानों की रणनीति बदलनी पड़ी है। इससे पहले दक्षिण के इतने करीब कभी ऐसा चक्रवाती सिस्टम नहीं देखा गया था।

इस मानसूनी असमंजस के बीच वर्तमान में पूरा उत्तर भारत भीषणतम गर्मी की चपेट में है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पारा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, राज्य का बांदा जिला 44.8 डिग्री सेल्सियस के साथ सबसे गर्म स्थान दर्ज किया गया। इसके साथ ही झांसी में 44.1 डिग्री, प्रयागराज में 44 डिग्री, आगरा में 43 डिग्री और वाराणसी हवाई अड्डे पर पारा 41.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। यह प्रचंड तापमान आने वाले समय में कृषि भूमि और जल स्रोतों के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसके लिए प्रशासनिक स्तर पर तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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