प्रशांत महासागर की गहराइयों से उठी एक प्राकृतिक हलचल ने दुनिया भर के नीति निर्माताओं और कृषि वैज्ञानिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। यूरोप के एक बड़े हिस्से को भीषण हीटवेव और रिकॉर्ड तोड़ तापमान से झुलसाने के बाद अब अलनीनो का यह खतरनाक साया भारतीय उपमहाद्वीप की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के मानसून को लेकर शुरुआती चेतावनियां जारी कर दी हैं, जिसमें मानसून के कमजोर रहने और देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात पैदा होने की 35 फीसदी आशंका जताई गई है। ऐसे समय में जब देश के करोड़ों किसान धान, मक्का, बाजरा और कपास जैसी मुख्य खरीफ फसलों की बुवाई की तैयारियों में जुटे हैं, इस मौसमी आपदा ने कृषि क्षेत्र के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। भारतीय कृषि की जीवनरेखा माने जाने वाले मानसून पर अलनीनो का यह सीधा प्रहार देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

इस आसन्न संकट की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और कृषि मंत्रालय ने युद्धस्तर पर मैराथन तैयारियां शुरू कर दी हैं। देश के इतिहास में संभवतः पहली बार नियमित खरीफ तैयारियों से हटकर जिलावार और फसल-विशिष्ट आपातकालीन रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। कृषि मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे अपने-अपने स्तर पर जिला स्तरीय फसल नियोजन और जल प्रबंधन की योजनाओं को अंतिम रूप दें। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि किसानों को इस विपरीत मौसम से निपटने के लिए व्यावहारिक और त्वरित समाधान उपलब्ध कराए जाएं। इसके तहत पारंपरिक फसलों के स्थान पर कम अवधि में पकने वाली और कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों जैसे दालें, कुछ विशेष प्रकार के बाजरा और सब्जियों की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की रणनीति बनाई गई है।

ऐतिहासिक आंकड़े और वैज्ञानिक अनुसंधान भी इस बात की गवाही देते हैं कि अलनीनो का भारतीय कृषि पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थान द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में तीन प्रमुख अलनीनो वर्षों—2002, 2004 और 2009—के मौसम चक्र और कृषि उत्पादन का गहन विश्लेषण किया गया। इस शोध के नेतृत्वकर्ता वैज्ञानिक सुभाष एन पिल्लई के अनुसार, अलनीनो के प्रभाव के चलते भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा के स्वरूप में भारी अनिश्चितता आती है। अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्षों के मुताबिक, पूर्व में आए अलनीनो वर्षों के दौरान देश के 77 प्रमुख जिलों में धान के उत्पादन में 10 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जबकि 65 जिलों में मक्के की पैदावार भी इसी तरह प्रभावित हुई थी। इसके अलावा, करीब 36-36 जिलों में मोटे अनाजों जैसे ज्वार और बाजरा की पैदावार में भी 10 फीसदी से ज्यादा की कमी देखी गई थी, जो यह साबित करता है कि मानसून आधारित कृषि इस संकट के प्रति कितनी संवेदनशील है।

भौगोलिक दृष्टि से इस मौसमी घटना का सबसे तीखा असर भारत के प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों पर पड़ने की आशंका है। वैज्ञानिकों ने जिन अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की है, उनमें आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे मुख्य चावल उत्पादक राज्य शामिल हैं। इन राज्यों के कई जिलों में फसल उत्पादन को बचाने के लिए सरकार अब सामान्य बीजों के स्थान पर सूखा-प्रतिरोधी और सूखा-सहिष्णु (drought-resistant) किस्मों के बीजों का वितरण मिशन मोड में कर रही है। जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों के अनुसार, इस साल का मुख्य जोर केवल संसाधन उपलब्ध कराने पर नहीं, बल्कि उपग्रह और मौसम प्रणालियों के माध्यम से निरंतर मौसम की निगरानी करने और किसानों को समय रहते सटीक कृषि-सलाह सेवाएं (agro-advisory) प्रदान करने पर है ताकि वे बुवाई में देरी या वैकल्पिक फसलों के चयन का सही निर्णय ले सकें।

वैश्विक परिदृश्य को देखें तो यह क्लाइमेट इमरजेंसी ऐसे समय में आ रही है जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी अनुकूल नहीं हैं। ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और कृषि रसायनों की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी की चिंताएं बढ़ गई हैं। एक तरफ महंगी लागत और दूसरी तरफ पानी की कमी ने भारतीय किसानों के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी कर दी है। यही वजह है कि सरकार ने राज्य कृषि विभागों को निर्देश दिया है कि वे सभी प्रमुख जलाशयों और नहर प्रणालियों के जल स्तर की चौबीसों घंटे निगरानी करें ताकि सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की एक-एक बूंद का कुशल प्रबंधन किया जा सके।

आने वाले कुछ सप्ताह भारत के कृषि इतिहास और करोड़ों किसानों की आजीविका के दृष्टिकोण से बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं। क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों का भी मानना है कि वैश्विक तापमान में हो रही यह वृद्धि अब एक स्थाई चुनौती बन चुकी है, जिसे दीर्घकालिक कृषि नीतियों में शामिल करना अनिवार्य है। सरकार द्वारा क्रियान्वित की जा रही जिला स्तरीय आकस्मिक योजनाएं और वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए गए स्थानीय अनुकूलन उपाय ही इस चुनौतीपूर्ण वर्ष में कृषि नुकसान को न्यूनतम रखने का एकमात्र सहारा हैं। यदि समय रहते इन रणनीतियों को धरातल पर सही ढंग से लागू कर दिया गया, तो भारतीय कृषि न केवल इस अलनीनो के कहर से सुरक्षित बाहर निकल पाएगी, बल्कि भविष्य के जलवायु संकटों से निपटने के लिए एक मजबूत और लचीला ढांचा भी तैयार कर सकेगी।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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