एल नीनो की वापसी से बढ़ सकता है भारत का संकट: कम बारिश और भीषण गर्मी की चेतावनी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट ने भारत सहित पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। वर्ष 2026 वैश्विक जलवायु के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हो सकता है क्योंकि प्रशांत महासागर के गर्म होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं, जो एल नीनो की सक्रियता की पुष्टि करते हैं। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह मौसमी चक्र अपनी पूरी तीव्रता के साथ लौटता है, तो भारत को न केवल भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा, बल्कि देश की जीवनरेखा माना जाने वाला मानसून भी सामान्य से काफी कम रह सकता है। यह स्थिति कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जूझ रही है।

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु स्वरूप है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है। हालांकि यह एक समुद्री घटना है, लेकिन इसका प्रभाव वैश्विक वायुमंडल और वर्षा चक्र पर पड़ता है। WMO के जलवायु पूर्वानुमान प्रमुख विल्फ्रेन मौफौमा ओकिया के अनुसार, साल की शुरुआत में स्थितियां तटस्थ थीं, लेकिन अब मॉडल तेजी से एल नीनो की ओर बदलाव दिखा रहे हैं। मई से जुलाई के बीच इसके सक्रिय होने की उच्च संभावना है और साल के अंत तक यह और अधिक मजबूत हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण एल नीनो के प्रभाव अब पहले से कहीं अधिक विनाशकारी होते जा रहे हैं, क्योंकि गर्म महासागरों और हवा में नमी धारण करने की क्षमता बढ़ने से मौसम की चरम घटनाएं बढ़ गई हैं।

भारत के संदर्भ में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से नीचे रह सकता है, जो दीर्घावधि औसत का लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है। एल नीनो वर्षों के दौरान भारत में अक्सर मानसून का कमजोर पड़ना, बारिश का असमान वितरण और लंबी शुष्क अवधि देखी जाती है। चूंकि भारत की अधिकांश खेती अब भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, इसलिए बारिश में मामूली कमी भी ग्रामीण आय और खाद्यान्न उत्पादन को संकट में डाल सकती है। इसके अतिरिक्त, तापमान में बढ़ोतरी से 'हीट स्ट्रोक' और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ने का खतरा है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

एक और चिंताजनक रिपोर्ट इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की ओर से आई है, जिसमें बताया गया है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में बर्फ का आवरण दीर्घावधि औसत से 27.8 प्रतिशत नीचे गिर गया है। यह पिछले चार वर्षों का सबसे निचला स्तर है। हिमालय की ये बर्फ की परतें गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के लिए प्राकृतिक जल भंडारण का कार्य करती हैं। बर्फ के कम जमाव और समय से पहले पिघलने का सीधा अर्थ है कि गर्मी के महीनों में इन नदियों का जल स्तर काफी कम हो जाएगा। यह स्थिति पेयजल आपूर्ति, सिंचाई प्रणालियों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए एक गंभीर जल संकट पैदा कर सकती है, जिसका असर मैदानी इलाकों तक फैलेगा।

निष्कर्षतः, 2026 में एल नीनो और हिमालयी बर्फ की कमी का दोहरा संकट भारत के लिए एक कड़ा इम्तिहान है। यह केवल एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा मामला है। सरकार और नीति निर्माताओं को अभी से जल संरक्षण रणनीतियों और कृषि सहायता कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। आने वाले महीनों में अप्रैल के बाद पूर्वानुमानों की सटीकता और बढ़ेगी, लेकिन वर्तमान संकेतों को देखते हुए सतर्कता ही एकमात्र बचाव है। यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो भीषण गर्मी और जल की कमी देश के विकास की गति को प्रभावित कर सकती है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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