दिल्ली में अल नीनो की सक्रियता से भीषण गर्मी का खतरा, पचास डिग्री के पार जा सकता है पारा|
बिना अल नीनो के ही ४६ डिग्री तक झुलस रही राजधानी; मौसम विभाग ने जारी किया विभिन्न राज्यों में मानसून आगमन का नया शेड्यूल।

दिल्ली के इंडिया गेट की पृष्ठभूमि में अत्यधिक गर्मी और पचास डिग्री सेल्सियस तापमान को प्रदर्शित करता एक प्रतीकात्मक चित्र।
उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से में ग्रीष्मकालीन मौसम की मार दिन-प्रतिदिन आक्रामक होती जा रही है। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई मैदानी राज्यों में सूर्य की तपिश ने स्थानीय जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, वर्तमान समय में बिना किसी बड़े वैश्विक मौसमी कारक के ही दिल्ली का अधिकतम तापमान पैंतालीस से छियालीस डिग्री सेल्सियस के करीब दर्ज किया जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि यदि आने वाले दिनों में प्रशांत महासागर में अल नीनो की सक्रियता पूर्ण रूप से बढ़ जाती है, तो देश के उत्तरी मैदानी इलाकों में स्थिति अत्यधिक चिंताजनक हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में दिल्ली और उसके आसपास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में पारा पचास डिग्री सेल्सियस के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकता है, जिससे अभूतपूर्व हीटवेव की स्थिति उत्पन्न होने की पूरी आशंका है।
भौगोलिक दृष्टि से इस समय उत्तर प्रदेश का बांदा जिला देश के सबसे गर्म क्षेत्रों में शीर्ष पर बना हुआ है। बांदा में पिछले कुछ दिनों से अधिकतम तापमान लगातार छियालीस से अड़तालीस डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया जा रहा है, जिसके चलते यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म शहरों की सूची में लगातार शीर्ष तीन में शामिल हो रहा है। इसके पूर्व भी मध्य भारत और उत्तर-पश्चिम भारत के इतिहास में इस प्रकार के चरम तापमान दर्ज किए जा चुके हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग सत्तर वर्ष पहले वर्ष 1956 में राजस्थान के अलवर में अधिकतम तापमान 50.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। वर्तमान समय में एयर कंडीशनर और आधुनिक शीतलन उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद इस प्रकार की भीषण गर्मी का सामना करना नागरिकों के स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए एक अत्यंत गंभीर चुनौती साबित हो रहा है।
जलवायु विज्ञान के नियमों के अनुसार, अल नीनो एक ऐसी वैश्विक परिघटना है जिसके सक्रिय होने पर समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है। इसका सीधा दुष्प्रभाव भारतीय मानसूनी हवाओं पर पड़ता है। अल नीनो के प्रभाव से मानसूनी हवाएं कमजोर हो जाती हैं, जिसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा में भारी कमी आती है और देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। भारत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी इस मौसमी चक्र से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इस वर्ष मई और जून के शुरुआती हफ्तों में सामान्य प्री-मानसून वर्षा की जो उम्मीद जताई जा रही थी, वह अल नीनो के बढ़ते दबाव के कारण लगातार टलती जा रही है, जिससे मैदानी इलाकों को ठंडी हवाओं का सहारा नहीं मिल पा रहा है।
इस भीषण तपन के बीच देश के विभिन्न राज्यों में मानसून के आगमन को लेकर मौसम विभाग ने एक नया शेड्यूल और आधिकारिक अपडेट साझा किया है। आईएमडी के पूर्वानुमान के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के सबसे पहले 26 मई के आसपास केरल के तट पर दस्तक देने की संभावना है। इसके बाद मानसूनी हवाएं आगे बढ़ते हुए 15 से 20 जून के मध्य तक मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय हो जाएंगी। उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में मानसून के पहुंचने की संभावित अवधि 15 से 22 जून के बीच आंकी गई है। वहीं, देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नागरिकों को मानसूनी वर्षा के लिए 25 जून तक प्रतीक्षा करनी होगी। राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में मानसून का प्रसार 25 जून से 5 जुलाई के बीच होने की उम्मीद है।
पचास डिग्री सेल्सियस के इस अत्यधिक तापमान को लेकर देश में तकनीकी और वैज्ञानिक स्तर पर बड़े विवाद भी सामने आए हैं। विशेष रूप से वर्ष 2024 के दौरान, 28 और 29 मई को दिल्ली के मंगेशपुर स्थित आईएमडी के स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) के सेंसर ने अधिकतम तापमान क्रमशः 49.9 डिग्री और 52.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया था। इस रीडिंग ने पूरे देश को चौंका दिया था क्योंकि यह भारत के मौसम विज्ञान इतिहास का सबसे उच्चतम स्तर था। हालांकि, मौसम विभाग ने तुरंत इस मामले की तकनीकी जांच बैठाई और आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि मंगेशपुर स्टेशन के सेंसर में तकनीकी खराबी और संभावित त्रुटि की वजह से यह अत्यधिक रीडिंग दर्ज हुई थी। विभाग ने साफ किया कि उस दिन दिल्ली के अधिकांश अन्य मौसम केंद्रों पर तापमान में केवल 0.5 से एक डिग्री सेल्सियस की ही वास्तविक वृद्धि देखी गई थी। इस प्रकार के सेंसर विवादों के बावजूद, पर्यावरणविदों का मानना है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में वास्तविक रूप से पचास डिग्री तापमान का सामना करने की आशंकाओं को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है, जो मानव अस्तित्व के लिए एक दीर्घकालिक संकट का संकेत है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
