जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों के बीच बहती चिनाब नदी पर स्थित बागलीहार जलविद्युत परियोजना एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। प्राकृतिक आपदा और कूटनीतिक विवाद दोनों ने इस रणनीतिक परियोजना को एक साथ केंद्र में ला खड़ा किया है। हालिया बाढ़ के कारण जहां परियोजना का एक चरण अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके संचालन को लेकर कानूनी प्रक्रिया तेज हो गई है।


बाढ़ के कारण उत्पादन पर ब्रेक:

फरवरी 2026 में चिनाब नदी में जलस्तर अचानक बढ़ने के बाद बागलीहार जलविद्युत परियोजना के 450 मेगावाट क्षमता वाले प्रथम चरण (स्टेज-I) की इकाइयों को एहतियातन बंद करना पड़ा। उच्च जलस्तर और तेज प्रवाह के कारण सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए बिजली उत्पादन अस्थायी रूप से रोक दिया गया। अधिकारियों के अनुसार, परिस्थितियां सामान्य होने तक उत्पादन पुनः शुरू नहीं किया जाएगा। यह परियोजना क्षेत्रीय ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, ऐसे में उत्पादन ठप होने का प्रभाव स्थानीय ग्रिड प्रबंधन और बिजली संतुलन पर भी पड़ा है।


इसी बीच, भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद में एक नया मोड़ आया है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने भारत को निर्देश दिया है कि वह फरवरी 2026 की शुरुआत तक बागलीहार और किशनगंगा जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन से संबंधित ‘पोंडेज लॉगबुक’ और अन्य तकनीकी अभिलेख प्रस्तुत करे। यह आदेश पाकिस्तान की उन आपत्तियों के संदर्भ में आया है, जिनमें उसने परियोजनाओं के संचालन को सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप न होने का आरोप लगाया है। अदालत की इस कार्रवाई ने संकेत दिया है कि कानूनी और तकनीकी स्तर पर विवाद निपटान की प्रक्रिया सक्रिय बनी हुई है।


क्षेत्रीय स्तर पर जलविद्युत परियोजनाओं की रफ्तार:

चिनाब नदी पर भारत द्वारा अन्य जलविद्युत परियोजनाओं को तेज गति से आगे बढ़ाने की नीति भी चर्चा में है। ऊर्जा सुरक्षा और क्षमता विस्तार के उद्देश्य से बड़े बांधों और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता पर काम तेज किया जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं को साझा जल संसाधनों पर दबाव के रूप में देखा है और इस पर आपत्ति जताई है। इससे दोनों देशों के बीच जल कूटनीति और अधिक संवेदनशील हो गई है।


सिंधु जल संधि और रणनीतिक आयाम:

1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे का आधार रही है। पिछले वर्ष कश्मीर में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित करने का निर्णय लिया था। इसके परिणामस्वरूप भारत को बागलीहार सहित अन्य परियोजनाओं में जल प्रवाह प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने में औपचारिक अधिसूचना प्रक्रिया से छूट मिली। चिनाब नदी, जो संधि के तहत पाकिस्तान को आवंटित प्रमुख नदियों में से एक है, पर स्थित बागलीहार परियोजना इसलिए केवल ऊर्जा उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का भी प्रतीक बन चुकी है।


क्यों अहम है बागलीहार परियोजना?

बागलीहार बांध एक रन-ऑफ-द-रिवर आधारित जलविद्युत परियोजना है, जिसकी कुल स्थापित क्षमता लगभग 900 मेगावाट है, जो दो चरणों में विभाजित है। यह परियोजना जम्मू-कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति और जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

परियोजना के गेट संचालन, जल प्रवाह नियंत्रण और तलछट निकासी जैसी तकनीकी प्रक्रियाएं समय-समय पर दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बनती रही हैं। हालिया घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि बागलीहार केवल एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और जल कूटनीति के जटिल समीकरणों का केंद्र है।


Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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