कोलकाता में आयोजित एक औपचारिक शपथ ग्रहण समारोह अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया, जब मंच पर दिखाई दी एक ऐसी परंपरा जिसने भारत के औपनिवेशिक अतीत की यादें ताज़ा कर दीं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के शपथ ग्रहण के दौरान एक न्यायाधीश द्वारा पहना गया लाल रंग का औपचारिक चोगा और ब्रिटिश शैली की न्यायिक विग सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में बहस का कारण बन गया। कई लोगों ने इसे न्यायपालिका में अब भी मौजूद औपनिवेशिक परंपराओं का प्रतीक बताया।

यह घटना उस समय सामने आई जब पश्चिम बंगाल के 22वें राज्यपाल के रूप में आर. एन. रवि ने पद की शपथ ली। शपथ समारोह में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सुजय पॉल ने उन्हें संविधान के अनुसार पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। समारोह पूरी तरह औपचारिक और गरिमामय माहौल में आयोजित हुआ, लेकिन न्यायाधीश के पारंपरिक ब्रिटिश शैली के परिधान चटक लाल रंग का चोगा और सफेद न्यायिक विग ने अचानक सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

जैसे ही समारोह की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए, इस पोशाक को लेकर बहस तेज हो गई। कई लोगों का मानना था कि इस तरह की वेशभूषा ब्रिटिश शासन के दौर की निशानी है, जिसे स्वतंत्र भारत में धीरे-धीरे समाप्त हो जाना चाहिए था। आलोचकों ने सवाल उठाया कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में ऐसी औपनिवेशिक प्रतीकों की आवश्यकता क्यों बनी हुई है।

दरअसल, न्यायाधीशों द्वारा पहने जाने वाले विग और विशेष प्रकार के चोगे की परंपरा 17वीं शताब्दी के ब्रिटिश न्यायिक तंत्र से जुड़ी है। उस समय यह पोशाक न्यायिक गरिमा, निष्पक्षता और अधिकार का प्रतीक मानी जाती थी। जब ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक अदालतों की स्थापना हुई, तो न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ कई औपचारिक परंपराएँ भी यहां लागू कर दी गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भले ही भारत की न्याय व्यवस्था में कई बदलाव आए, लेकिन कुछ औपचारिक और सांकेतिक परंपराएँ अब भी बनी हुई हैं।

हालांकि भारत की अधिकांश अदालतों में आज न्यायाधीश आमतौर पर साधारण काले गाउन में दिखाई देते हैं और ब्रिटिश शैली की विग का प्रयोग लगभग समाप्त हो चुका है। यही कारण है कि राज्यपाल के शपथ ग्रहण समारोह में इस पारंपरिक विग और लाल चोगे की मौजूदगी ने लोगों का ध्यान खींचा और इसे लेकर चर्चा तेज हो गई।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस को फिर से जीवित कर दिया है क्या भारतीय संस्थानों में मौजूद औपनिवेशिक प्रतीकों और परंपराओं को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए, या उन्हें इतिहास और संस्थागत परंपरा के रूप में बनाए रखना चाहिए। पश्चिम बंगाल के इस शपथ ग्रहण समारोह ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आधुनिक भारत अपनी संस्थागत पहचान को किस तरह परिभाषित करना चाहता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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