90 के दशक और शुरुआती 2000 के दौर की यादें ताज़ा करते हुए गायिका फाल्गुनी पाठक के पुराने म्यूज़िक वीडियो का एक छोटा-सा क्लिप इन दिनों सोशल मीडिया पर ज़ोरदार बहस का कारण बन गया है। वीडियो में गरबा की धुनों पर थिरकते साफ़-सुथरे, एथलेटिक और क्लीन-शेव पुरुष नज़र आते हैं, जिसने एक बार फिर भारत में पुरुष सौंदर्य के बदलते मानकों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह बहस केवल फैशन या स्टाइल तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके साथ फिटनेस, स्वास्थ्य और सामाजिक धारणा जैसे मुद्दे भी जुड़ गए हैं। सोशल मीडिया यूज़र्स का एक वर्ग इस वीडियो को “पुराने अच्छे दिनों” की मिसाल बताते हुए आज के घनी दाढ़ी वाले ट्रेंड की तुलना में क्लीन-शेव लुक को ज़्यादा आकर्षक और आत्मविश्वासी बता रहा है।



दाढ़ी ट्रेंड की जड़ें और विराट कोहली का ज़िक्र:

चर्चा के दौरान कई यूज़र्स ने भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम भी सामने रखा। उनका मानना है कि 2016 के बाद विराट कोहली की फुल दाढ़ी ने युवाओं में इस लुक को लोकप्रिय बना दिया। कुछ टिप्पणियों में यहां तक कहा गया कि दाढ़ी कई बार डबल चिन और बढ़ते पेट को छिपाने का ज़रिया बन गई है।

हालांकि, विराट कोहली के समर्थकों ने इस तर्क को खारिज करते हुए उनके करियर के शुरुआती वर्षों की तस्वीरें साझा कीं, जब वे क्लीन-शेव रहते हुए भी देश के सबसे आकर्षक पुरुषों की सूचियों में शीर्ष पर रहे।



फिटनेस बनाम ग्रूमिंग की बहस:

इस ट्रेंड से जुड़ी मीम्स और टिप्पणियों के बीच एक गंभीर पहलू भी उभरकर सामने आया है। विशेषज्ञों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने भारत में पुरुषों में बढ़ती मोटापे की दर पर ध्यान दिलाया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार,

  • 1990 में पुरुषों में मोटापे की दर 1 प्रतिशत से भी कम थी
  • 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 5 प्रतिशत से अधिक हो गया

इन आंकड़ों को सामने रखते हुए कई लोगों ने यह तर्क दिया कि असली मुद्दा दाढ़ी या क्लीन-शेव नहीं, बल्कि शारीरिक फिटनेस और स्वस्थ जीवनशैली है। उनका कहना है कि एथलेटिक शरीर और संतुलित फिटनेस किसी भी ग्रूमिंग ट्रेंड से ज़्यादा प्रभावशाली होती है।


पुरुष सौंदर्य की बदलती परिभाषा:

दूसरी ओर, दाढ़ी समर्थकों का मानना है कि यह पुरुषत्व, परिपक्वता और व्यक्तित्व को उभारने का प्रतीक है। उनके अनुसार, सौंदर्य के मानक समय के साथ बदलते रहते हैं और हर दौर की अपनी पहचान होती है। फिर भी, फाल्गुनी पाठक के वीडियो से शुरू हुई यह बहस एक व्यापक सामाजिक संदेश की ओर इशारा करती है—जहां केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, फिटनेस और आत्मविश्वास को असली आकर्षण माना जा रहा है।


सोशल मीडिया पर छिड़ी यह चर्चा यह स्पष्ट करती है कि भारत में पुरुष सौंदर्य की अवधारणा एक नए मोड़ पर खड़ी है। क्लीन-शेव बनाम दाढ़ी की बहस के बीच, मूल संदेश यही उभरता है कि स्वस्थ, सक्रिय और फिट शरीर किसी भी ट्रेंड से ऊपर है। यह बहस केवल नास्टैल्जिया नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता का भी प्रतिबिंब है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

Next Story