नर्मदा नदी में हज़ारों लीटर दूध का चढ़ावा ; जानें वायरल वीडियो को देख क्यों भड़क उठे लोग
नर्मदा नदी में 11,000–12,000 लीटर दूध बहाने का वीडियो वायरल होने के बाद आस्था, पर्यावरण और संसाधनों के उपयोग को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। इस घटना ने धार्मिक परंपराओं और आधुनिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

नर्मदा नदी के तट पर बड़ी मात्रा में दूध अर्पित करते श्रद्धालु
देशभर में एक वायरल वीडियो ने आस्था, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वीडियो में देखा जा सकता है कि श्रद्धालु एक टैंकर के माध्यम से लगभग 11,000 से 12,000 लीटर दूध सीधे नर्मदा नदी में बहा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह धार्मिक अनुष्ठान के तहत किया गया, जिसे भक्तजन पवित्र अर्पण मानते हैं।
यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गई, जिसके बाद लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। एक ओर श्रद्धालु इसे सदियों पुरानी परंपरा और ‘नर्मदा अभिषेक’ जैसे धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ते हुए इसे आस्था का प्रतीक बता रहे हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार के अर्पण से नदी और उससे जुड़े पारिस्थितिक तंत्र को संतुलन और शुद्धता मिलती है। वहीं दूसरी ओर आलोचकों ने इस कृत्य को संसाधनों की बर्बादी और सामाजिक असंवेदनशीलता का उदाहरण बताया है, खासकर उस समय जब देश के कई हिस्सों में गरीबी और कुपोषण जैसी गंभीर समस्याएं मौजूद हैं।
11 हजार लीटर दूध नर्मदा नदी में चढ़ा दिया गया !! pic.twitter.com/xep3ZAZOs8
— Sachin Gupta (@Sachingupta) April 9, 2026
पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी इस घटना को लेकर चिंता जताई है। उनके अनुसार, इतनी बड़ी मात्रा में दूध को नदी में डालने से जल में ऑक्सीजन का स्तर घट सकता है, जिससे जलीय जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। दूध के विघटन की प्रक्रिया से जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) बढ़ती है, जो जल की गुणवत्ता को प्रभावित करती है और पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ सकती है। इसके अलावा, दूध की परत पानी की सतह पर फैलकर जलीय जीवों के लिए खतरा बन सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक व्यापक नैतिक बहस को भी जन्म दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को बदलते समय और पर्यावरणीय जरूरतों के अनुसार ढालना चाहिए। साथ ही यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि क्या इतनी बड़ी मात्रा में उपयोगी संसाधनों को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के विकल्पों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। आस्था और उसके प्रतीकों के बीच संतुलन बनाना आज के दौर में एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।
हालांकि नदियों में दूध अर्पित करने की परंपरा नई नहीं है और सदियों से चली आ रही है, लेकिन इस घटना में इस्तेमाल की गई विशाल मात्रा और सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी व्यापक पहुंच ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। यह प्रकरण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने समाज के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आधुनिक समय में परंपरा, पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
इस बीच, मध्य प्रदेश के सेहोर जिले में श्री धुनिवाले दादाजी महाराज के अनुयायियों ने बुधवार को अपने धार्मिक कार्यक्रम का समापन करते हुए लगभग 11,000 लीटर दूध लगभग 25 लाख रुपये मूल्य का नर्मदा नदी में अर्पित किया। इसके साथ ही 41 टन हवन सामग्री का अग्नि अनुष्ठान भी संपन्न किया गया, जो इस पूरे प्रकरण को और भव्य और विवादास्पद बना गया।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
