क्या आपके घर भी आ रहा है 'सफेद जहर'? आंध्र प्रदेश में 12 मौतों के बाद जनता का फूटा गुस्सा, जानें पूरी रिपोर्ट
आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी में जहरीले दूध से 12 मौतों और मसालों में खतरनाक रसायनों की जांच रिपोर्ट के बाद देश में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मिलावट के इन मामलों ने FSSAI की निगरानी व्यवस्था और प्रवर्तन को लेकर व्यापक बहस और जनाक्रोश को जन्म दिया है।

FSSAI
भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल के दिनों में दूध में घातक रसायनों की मिलावट और लोकप्रिय मसालों में खतरनाक रासायनिक अवशेष पाए जाने की घटनाओं ने आम लोगों की चिंता को बढ़ा दिया है। इन मामलों के सामने आने के बाद देश की सर्वोच्च खाद्य नियामक संस्था फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था को लेकर तीखी आलोचना हो रही है। विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों का कहना है कि रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में मिलावट की घटनाएं लगातार सामने आना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
आंध्र प्रदेश में जहरीले दूध से मौतों का मामला:
सबसे गंभीर घटना आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले में सामने आई, जहां दूध में जहरीले रसायन की मिलावट के कारण कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक लोग बीमार पड़ गए। जांच में सामने आया कि यह दूध एक अनधिकृत डेयरी यूनिट से आया था, जहां खराब रेफ्रिजरेशन सिस्टम के कारण दूध में एथिलीन ग्लाइकोल नामक विषैला रसायन मिल गया था।
फॉरेंसिक जांच में इस रसायन की पुष्टि होने के बाद प्रशासन ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया। एथिलीन ग्लाइकोल आमतौर पर औद्योगिक कूलेंट और एंटीफ्रीज के रूप में इस्तेमाल होता है और मानव शरीर में पहुंचने पर यह बेहद घातक साबित हो सकता है। इस घटना ने दूध की गुणवत्ता और उसकी निगरानी व्यवस्था को लेकर देशभर में चिंता पैदा कर दी।
सिंथेटिक दूध के रैकेट का खुलासा:
जांच एजेंसियों ने कई राज्यों में छापेमारी के दौरान सिंथेटिक दूध बनाने वाले गिरोहों का भी पर्दाफाश किया है। इन अवैध इकाइयों में असली दूध की बहुत कम मात्रा में खतरनाक रसायन मिलाकर बड़ी मात्रा में नकली दूध तैयार किया जा रहा था।
जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के अनुसार नकली दूध बनाने में जिन पदार्थों का इस्तेमाल किया जा रहा था, उनमें शामिल हैं:
- यूरिया
- डिटर्जेंट पाउडर
- कास्टिक सोडा
- रिफाइंड ऑयल
- ग्लूकोज
एक कार्रवाई के दौरान गुजरात में अधिकारियों ने लगभग 2000 लीटर मिलावटी दूध और 1100 लीटर नकली छाछ जब्त कर नष्ट कर दिया। जांच में यह भी पता चला कि ये इकाइयां रोजाना लगभग 1700 से 1800 लीटर सिंथेटिक दूध तैयार कर रही थीं, जबकि असली दूध की मात्रा केवल करीब 300 लीटर ही होती थी।
मिलावटी दूध के स्वास्थ्य पर खतरनाक प्रभाव:
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे रसायनों से मिलावटी दूध का सेवन बेहद खतरनाक हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जैसे:
- तीव्र फूड पॉइजनिंग और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण
- किडनी और अन्य अंगों को स्थायी नुकसान
- लंबे समय में कैंसर और हृदय संबंधी समस्याएं
दूध की घटना के समानांतर एक और विवाद तब खड़ा हुआ जब स्वतंत्र प्रयोगशाला ट्रस्टिफाइड की जांच रिपोर्ट में कुछ लोकप्रिय मसाला ब्रांडों के उत्पादों में खतरनाक स्तर तक कीटनाशक अवशेष और बैक्टीरिया पाए गए। जांच में चार अलग-अलग मसाला मिश्रण निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषित पाए गए। इस खुलासे ने यह सवाल और गहरा कर दिया कि जिन मसालों का इस्तेमाल लगभग हर भारतीय रसोई में रोज होता है, उनकी गुणवत्ता की निगरानी कितनी प्रभावी है।
FSSAI की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल:
इन घटनाओं के बाद खाद्य सुरक्षा नियामक संस्था FSSAI की कार्यप्रणाली और नेतृत्व को लेकर व्यापक आलोचना हो रही है। आलोचकों का कहना है कि लगातार सामने आ रहे मिलावट के मामलों के बावजूद निगरानी और कार्रवाई की गति पर्याप्त नहीं है। संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजित पुनहानी के नेतृत्व पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कई विशेषज्ञों और नागरिक समूहों ने खाद्य सुरक्षा तंत्र में व्यापक सुधार और कड़े प्रवर्तन की मांग की है।
नियामक व्यवस्था को लेकर मुख्य आलोचनाएं इस प्रकार सामने आई हैं:
- कार्रवाई में देरी: कई मामलों में नियामक संस्थाएं तब सक्रिय होती हैं जब विवाद सार्वजनिक हो जाता है।
- कमजोर प्रवर्तन: कानून मौजूद होने के बावजूद देश के विशाल और असंगठित खाद्य बाजार में निगरानी सीमित है।
- परीक्षण अवसंरचना की कमी: कई राज्यों में पर्याप्त प्रयोगशालाएं और प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं।
- कम सजा दर: मिलावट के मामलों में दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अक्सर लंबी और धीमी रहती है।
मिलावट की समस्या का व्यापक पैमाना:
खाद्य सुरक्षा निगरानी से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या केवल कुछ मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर फैली हुई है। वर्ष 2023-24 के दौरान देशभर में जांचे गए लगभग 1.5 लाख खाद्य नमूनों में से 33,000 से अधिक नमूने निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर जांचे गए करीब 12 प्रतिशत मसाला नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए। कुछ क्षेत्रों में तो 80 प्रतिशत से अधिक पनीर के नमूने भी मानकों पर खरे नहीं उतरे, जिनमें कई में हानिकारक पदार्थ पाए गए।
क्यों बना राष्ट्रीय बहस का मुद्दा:
दूध और मसाले भारतीय भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं। लगभग हर घर में रोजाना इनका उपयोग होता है। ऐसे में जब इन्हीं बुनियादी खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, तो यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं रहता बल्कि लोगों के विश्वास से भी जुड़ जाता है। इसी कारण यह मामला सोशल मीडिया, समाचार मंचों और सार्वजनिक विमर्श में तेजी से राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।
सरकार और नियामक एजेंसियों की प्रतिक्रिया:
घटनाओं के सामने आने के बाद प्रशासन ने कई कदम उठाने की घोषणा की है। इनमें शामिल हैं:
- अवैध खाद्य इकाइयों पर छापेमारी
- असुरक्षित खाद्य पदार्थों की जब्ती और नष्ट करना
- राज्यों को निरीक्षण बढ़ाने के निर्देश
- मिलावट पहचानने के लिए जनजागरूकता अभियान
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 के तहत FSSAI को खाद्य कारोबारों का निरीक्षण करने, नमूने लेने और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि कानून मौजूद होने के बावजूद प्रभावी क्रियान्वयन ही असली चुनौती है। दूध और मसालों से जुड़े हालिया खुलासों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में खाद्य सुरक्षा प्रणाली को और अधिक सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
