Indian Railways overcrowding : महानगरों की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल आज एक अभूतपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ी है। दुनिया के सबसे व्यस्त रेल नेटवर्क पर हर दिन सफर करने वाले 2.3 करोड़ यात्रियों की जिंदगी और उनका संघर्ष एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गया है। मुंबई की लोकल ट्रेनों से लेकर लंबी दूरी की एक्सप्रेस गाड़ियों के जनरल कोचों से सामने आ रही तस्वीरें आम आदमी की बेबसी को बयां कर रही हैं। पीक-आवर की भीड़ और प्रवासी कामगारों के भारी दबाव के चलते ट्रेनों में तिल रखने की जगह नहीं बची है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस भयावह स्थिति की तस्दीक करते हैं, जिनमें पुरुष यात्री लाल और सफेद रंग की ट्रेनों के दरवाजों और खिड़कियों पर लटके नजर आ रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर बैंगनी रंग के महिला कोचों (लेडीज स्पेशल) से सवारियां बाहर की तरफ उमड़ रही हैं।

इस बदहाली ने न केवल यात्रियों के सब्र का बांध तोड़ दिया है, बल्कि सार्वजनिक रूप से तीखी प्रतिक्रियाओं को भी जन्म दिया है। पूर्व क्रिकेटर और राजनीतिक दिग्गज कीर्ति आजाद सहित कई प्रमुख हस्तियों ने इस अव्यवस्था पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस भीड़भाड़ की तुलना बेहद कड़े शब्दों में करते हुए इसे 'कॉकरोच (तिलचट्टों) की रोजमर्रा की जिंदगी' करार दिया, जिसने पूरे देश में एक बड़े विवाद और आक्रोश को भड़का दिया है। आम नागरिकों का कहना है कि टैक्स देने और टिकट खरीदने के बावजूद उन्हें गरिमापूर्ण सफर की बुनियादी सुविधा भी मयस्सर नहीं हो पा रही है।

प्रशासनिक और आधिकारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय रेलवे ने स्थिति को सुधारने के लिए कई बड़े कदम उठाने का दावा किया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014 के बाद से रेल हादसों में 89 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो ट्रैक आधुनिकीकरण और सुरक्षा प्रणालियों में सुधार को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, यात्रियों की बढ़ती तादाद को संभालने के लिए पिछले वर्ष ही नेटवर्क में 1,250 से अधिक नए जनरल कोच जोड़े गए हैं। बावजूद इसके, आलोचकों और विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। रेलवे की क्षमता और मांग के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण वर्तमान में करीब 3.39 करोड़ वेटिंग लिस्ट (प्रतीक्षा सूची) के टिकट हैं, जो यह बताते हैं कि ट्रेनों की संख्या मांग के मुकाबले कितनी कम है।

इस संकट को गहरा करने में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स) में होने वाली देरी भी एक प्रमुख कारक रही है। मुंबई जैसे महानगर में, जहां लोकल ट्रेनों पर अत्यधिक दबाव है, वहां आरे मेट्रो जैसी महत्वपूर्ण परिवहन परियोजनाओं में हो रहे विलंब ने स्थिति को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। यदि ये वैकल्पिक परिवहन माध्यम समय पर तैयार हो जाते, तो उपनगरीय रेलवे नेटवर्क से लाखों यात्रियों का बोझ कम किया जा सकता था। वर्तमान विधिक और प्रशासनिक तंत्र के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस बुनियादी ढांचे के विकास की गति को आबादी की रफ्तार के साथ मिलाने की है।

भारतीय रेल के इस सफर में यात्रियों की बेबसी केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक संकट की ओर इशारा करती है। देश के आर्थिक पहिये को गति देने वाले ये कामकाजी वर्ग हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जब तक मांग और आपूर्ति के इस विशाल अंतर को पाटने के लिए युद्धस्तर पर ठोस नीतिगत फैसले नहीं लिए जाते और वैकल्पिक शहरी परिवहन प्रणालियों को गति नहीं दी जाती, तब तक करोड़ों भारतीयों का यह दैनिक सफर गरिमा और सुरक्षा से कोसों दूर, महज एक संघर्ष बनकर रह जाएगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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