कर्नाटक की सड़कों पर 19 फरवरी 2026 को उस समय असाधारण हलचल देखने को मिली, जब राज्य की चारों सरकारी परिवहन निगमों के कर्मचारी एकजुट होकर राजधानी बेंगलुरु की ओर कूच कर गए। ‘बेंगलुरु चलो’ के संयुक्त बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन ने राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और सरकार के बीच चल रहे वेतन विवाद को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया।

राज्य के प्रमुख परिवहन उपक्रम कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC), बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (BMTC), नॉर्थ वेस्ट कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (NWKRTC) और कल्याण कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (KKRTC) के कर्मचारियों ने लंबे समय से लंबित वेतन बकाया और वेतनमान में संशोधन की मांग को लेकर यह सामूहिक प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का मुख्य आग्रह था कि 38 महीनों का पूर्ण वेतन बकाया, जिसकी अनुमानित राशि लगभग 1,785 करोड़ रुपये बताई जा रही है, एकमुश्त चुकाया जाए तथा 25 प्रतिशत वेतनवृद्धि लागू की जाए।


सरकार द्वारा आंशिक राहत की घोषणा के बावजूद यूनियन नेताओं ने अपना रुख सख्त बनाए रखा। राज्य सरकार ने 26 महीनों के लंबित वेतन बकाया, जिसकी कुल राशि लगभग 1,239.5 करोड़ रुपये है, को जारी करने की घोषणा की। साथ ही 1 अप्रैल 2025 से वेतन पुनरीक्षण पर चर्चा शुरू करने का आश्वासन भी दिया गया। हालांकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जब तक 38 महीनों का पूरा बकाया और स्पष्ट वेतनवृद्धि संबंधी लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक उनका आंदोलन समाप्त नहीं होगा।

दिलचस्प रूप से, इतने बड़े शक्ति प्रदर्शन के बावजूद 19 फरवरी को बस सेवाओं पर व्यापक असर नहीं पड़ा। अधिकांश मार्गों पर बसें निर्धारित समय के अनुसार संचालित होती रहीं। परिवहन निगमों ने संभावित अव्यवस्था को रोकने के लिए सख्त प्रशासनिक रुख अपनाया। विशेष रूप से KSRTC ने ‘नो वर्क, नो पे’ नीति और अनुशासनात्मक कार्रवाई संबंधी निर्देश जारी किए, ताकि कर्मचारियों की अनुपस्थिति या सामूहिक अवकाश की स्थिति में सेवाएं बाधित न हों।


हालांकि, आंदोलन की तीव्रता और यूनियनों की चेतावनी ने राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है। कर्मचारी संगठनों ने स्पष्ट किया है कि यदि 19 फरवरी की निर्धारित समयसीमा तक लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तो 20 फरवरी से राज्यव्यापी बस सेवाएं ठप की जा सकती हैं। फिलहाल पूर्ण हड़ताल की पुष्टि नहीं हुई है और अधिकांश सेवाएं जारी हैं, लेकिन वार्ता विफल होने की स्थिति में परिवहन व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।

यह विवाद केवल वेतन बकाया का प्रश्न नहीं, बल्कि राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की स्थिरता और लाखों दैनिक यात्रियों की निर्भरता से भी जुड़ा है। कर्नाटक में सरकारी बस सेवाएं ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच जीवनरेखा मानी जाती हैं। ऐसे में किसी भी व्यापक हड़ताल का असर न केवल यात्रियों बल्कि आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी निगाहें सरकार और यूनियनों के बीच चल रही बातचीत पर टिकी हैं। यदि समाधान शीघ्र नहीं निकला, तो कर्नाटक की सड़कों पर बसों के पहिए थमने की आशंका एक बड़े प्रशासनिक और सामाजिक संकट का रूप ले सकती है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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