देहरादून में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की नई पहल, 100 डीएफएल क्षमता वाले कीटपालन गृह का सफल परीक्षण
आनंद कुमार शुक्ला ने आईआईटी रुड़की के सहयोग से विकसित किफायती कीटपालन गृह, शहतूत आधारित कृषि मॉडल और अनुसंधान गतिविधियों का जायजा लिया।

उत्तर प्रदेश रेशम निदेशालय के निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने 09 अक्टूबर 2026 को सहसपुर, देहरादून स्थित क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र का तकनीकी भ्रमण किया।
उत्तर प्रदेश रेशम निदेशालय के निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने 09 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत सहसपुर, देहरादून स्थित क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र का विस्तृत तकनीकी भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने रेशम उत्पादन की उन्नत तकनीकों, अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों और किसानों की आय बढ़ाने के लिए विकसित किए जा रहे नवाचारों का जायजा लिया। केंद्रीय रेशम बोर्ड और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के सहयोग से विकसित आदर्श एवं वहनीय रेशम कीटपालन गृह तथा शरद ऋतु में इसके सफल परीक्षण ने भ्रमण के दौरान विशेष ध्यान आकर्षित किया।
उत्तर प्रदेश रेशम निदेशालय के निदेशक श्री आनंद कुमार शुक्ला, भा.प्र.से. ने केंद्र में संचालित विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं और तकनीकी गतिविधियों का अवलोकन किया। भ्रमण का उद्देश्य वैज्ञानिक रेशम उत्पादन तकनीकों के प्रसार के साथ अनुसंधान संस्थानों और रेशम उत्पादन से संबंधित विभागों के बीच तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना रहा।
इस दौरान केंद्रीय रेशम बोर्ड और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के बीच संचालित सहयोगात्मक परियोजना ‘आदर्श एवं वहनीय रेशम कीटपालन गृह का विकास’ के अंतर्गत तैयार किए गए नवीन कीटपालन गृह की जानकारी दी गई। केंद्र प्रभारी डॉ. पवन सैनी, वैज्ञानिक-डी ने बताया कि इस कीटपालन गृह में लगभग 100 डी.एफ.एल. का पालन करने की क्षमता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित इस संरचना का उद्देश्य रेशमकीट पालन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराने के साथ रेशम उत्पादकों को किफायती और व्यावहारिक व्यवस्था प्रदान करना है। इसके माध्यम से सीमित संसाधनों में वैज्ञानिक रेशमकीट पालन को प्रोत्साहित करने तथा इसकी उपयोगिता, कार्यक्षमता और तकनीकी व्यवहार्यता प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है।
डॉ. सैनी ने बताया कि नवीन कीटपालन गृह में शरद ऋतु के दौरान रेशमकीट पालन का सफल परीक्षण पूरा किया जा चुका है। इस परीक्षण के माध्यम से संरचना की व्यावहारिक उपयोगिता और मौसमी परिस्थितियों में रेशमकीट पालन के लिए इसकी उपयुक्तता का आकलन किया गया।
भ्रमण के दौरान केंद्र प्रभारी ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सहयोग से संचालित ‘उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शहतूत वृक्षारोपण के विकास’ परियोजना की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि यह परियोजना वर्तमान में तीन राजमार्ग खंडों पर संचालित की जा रही है। इनमें राष्ट्रीय राजमार्ग-72ए/73 (रुड़की), राष्ट्रीय राजमार्ग-74 (नजीबाबाद) तथा राष्ट्रीय राजमार्ग-125 (सितारगंज–खटीमा) शामिल हैं। इस परियोजना का उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शहतूत वृक्षारोपण को बढ़ावा देना और शहतूत आधारित रेशम उत्पादन की संभावनाओं का विस्तार करना है।
इसके अतिरिक्त, डॉ. पवन सैनी ने श्री आनंद कुमार शुक्ला को केंद्र द्वारा विकसित कृषि आधारित शहतूत वृक्षारोपण मॉडल की कार्यप्रणाली से अवगत कराया। इस मॉडल में वृक्षीय पद्धति से लगाए गए शहतूत के पौधों की कतारों के बीच उपलब्ध भूमि पर उपयुक्त कृषि फसलों की अंतःफसली खेती को प्रोत्साहित किया जाता है। इस एकीकृत कृषि-रेशम उत्पादन प्रणाली का उद्देश्य भूमि और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है। इसके तहत शहतूत की पत्तियों के उत्पादन के साथ कृषि फसलों से अतिरिक्त आय अर्जित करने के अवसर उपलब्ध कराकर किसानों की समग्र आय बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
यह मॉडल विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है। इसके माध्यम से एक ही भूमि पर कृषि और रेशम उत्पादन से दोहरे आर्थिक लाभ प्राप्त करने की संभावनाएं विकसित होती हैं। साथ ही, यह कृषि एवं रेशम उत्पादन के एकीकरण, फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि आधारित आजीविका को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
तकनीकी भ्रमण के दौरान श्री शुक्ला ने केंद्र परिसर में स्थापित रेशम संग्रहालय का भी अवलोकन किया। संग्रहालय में रेशम उत्पादन से जुड़ी विभिन्न तकनीकों, उपकरणों और रेशम उद्योग की गतिविधियों को प्रदर्शित किया गया है। उन्हें बताया गया कि केंद्र की ओर से विकसित तकनीकों और अनुसंधान उपलब्धियों को रेशम उत्पादकों तक पहुंचाने तथा वैज्ञानिक रेशम उत्पादन पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न विस्तार एवं संचार कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
श्री आनंद कुमार शुक्ला ने केंद्र द्वारा विकसित तकनीकों और व्यावहारिक नवाचारों की सराहना की। यह भ्रमण रेशम उत्पादन से संबंधित विभागों और अनुसंधान संस्थानों के बीच तकनीकी जानकारी के आदान-प्रदान को मजबूत करने तथा उन्नत, किफायती और वैज्ञानिक रेशमकीट पालन तकनीकों के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण रहा। लगभग 100 डी.एफ.एल. क्षमता वाले कीटपालन गृह, शरद ऋतु में सफल परीक्षण और शहतूत आधारित कृषि मॉडल जैसी पहलों के माध्यम से रेशम उत्पादन की तकनीकी संभावनाओं तथा किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

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