Swami Avimukteshwaranand Biography : संगम की रेती पर बसा माघ मेला इन दिनों केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है। इस विवाद की धुरी हैं ज्योतिषपीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। मौनी अमावस्या पर संगम स्नान को लेकर शुरू हुई यह तकरार अब उनके 'शंकराचार्य' पद की वैधता तक पहुंच चुकी है, जिसने धर्म, राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक जटिल त्रिकोण बना दिया है।

उमाशंकर से शंकराचार्य तक: एक परिचय

15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्मे उमाशंकर उपाध्याय (बचपन का नाम) का झुकाव कम उम्र में ही अध्यात्म की ओर हो गया था।

शिक्षा और छात्र राजनीति: वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त करने वाले उमाशंकर केवल धार्मिक शास्त्रों तक सीमित नहीं रहे; 1994 में उन्होंने छात्रसंघ चुनाव जीतकर अपने नेतृत्व कौशल का लोहा मनवाया।

दीक्षा और संन्यास: ज्योतिषपीठ के पूर्व पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के सानिध्य में 2003 में उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा मिली और वे 'स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती' कहलाए।

आंदोलनों की मुखर आवाज: चाहे 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग हो या जोशीमठ भू-धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, वे हमेशा सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं।

विवाद का केंद्र : माघ मेला 2026 की घटना

विवाद उस समय शुरू हुआ जब मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ रथ और पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले। प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्हें पैदल स्नान करने का निर्देश दिया, जिसे स्वामी जी ने सदियों पुरानी परंपरा का अपमान बताया। इसके बाद हुई झड़प और पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में उन्होंने संगम तट पर ही धरना शुरू कर दिया।

कानूनी पेंच: पद की वैधता और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

प्रयागराज मेला प्रशासन ने हाल ही में एक नोटिस जारी कर उनके 'शंकराचार्य' पद के उपयोग पर स्पष्टीकरण मांगा है।

प्रशासन का पक्ष: प्रशासन के अनुसार, ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की नियुक्ति का मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट (सिविल अपील 3010/2020) में लंबित है। अदालत ने अंतरिम आदेश के जरिए पट्टाभिषेक (Coronation) पर रोक लगाई थी, इसलिए आधिकारिक रूप से उन्हें यह पदवी आवंटित नहीं की गई है।

शंकराचार्य का पक्ष: स्वामी जी के विधिक सलाहकारों का तर्क है कि उनका अभिषेक अदालत के स्टे ऑर्डर से पूर्व ही हो चुका था। उनके अनुसार, शंकराचार्य पद की मर्यादा धार्मिक परंपराओं से तय होती है, न कि राजनीतिक या प्रशासनिक आदेशों से।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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