यूपी की सत्ता से 15 साल दूर दलित राजनीति, क्या 2027 में चंद्रशेखर आजाद बदलेंगे सियासी तस्वीर?
उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति 2012 से सत्ता से बाहर है। 2007 में 206 सीटें जीतने वाली बसपा 2022 में एक सीट पर सिमट गई। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चंद्रशेखर आजाद की भूमिका और दलित मतदाताओं के बदलते रुझान पर नजरें टिकी हैं।

उत्तर प्रदेश में 2027 चुनाव से पहले दलित मतदाताओं को साधने में जुटे प्रमुख राजनीतिक दल।
उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति पिछले डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर है। कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2012 में सरकार गंवाने के बाद पार्टी दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति की सत्ता में वापसी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस बीच भीम आर्मी के संस्थापक और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व को लेकर भी चर्चा तेज है। सवाल यह है कि क्या वह दलित राजनीति को नई दिशा देकर उत्तर प्रदेश की सियासत का समीकरण बदल पाएंगे?
2007 के विधानसभा चुनाव में 206 सीटें जीतने वाली बसपा का राजनीतिक आधार लगातार कमजोर हुआ है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और उसे 12.88 प्रतिशत वोट मिले। चुनावी प्रदर्शन में आई इस गिरावट ने बसपा के सामने अपने पुराने जनाधार को बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि, वोट प्रतिशत से संकेत मिलता है कि पार्टी का जनसमर्थन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
बसपा के सामने संगठन की कमजोरी, नेतृत्व का सीमित जनसंपर्क और बदलते राजनीतिक समीकरण प्रमुख चुनौतियां हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी दलित समुदायों के बीच अपना समर्थन बढ़ाने में जुटी है। समाजवादी पार्टी भी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए समीकरण के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन की सफलता के बाद राज्य में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा बढ़ी। कांग्रेस भी दलित नेतृत्व और सामाजिक प्रतिनिधित्व के जरिए अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में बसपा के सामने अपने पारंपरिक मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती है, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हैं। दलित राजनीति में नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर बन रही इस प्रतिस्पर्धा के बीच चंद्रशेखर आजाद की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
बसपा के कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन के बीच भीम आर्मी के संस्थापक और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद एक नए दलित नेता के रूप में उभरे हैं। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर उनकी सक्रियता और युवाओं के बीच लोकप्रियता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई है। उनकी राजनीति को दलित नेतृत्व के नए विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से जीत चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। उन्होंने भाजपा के ओम कुमार को 1,51,473 मतों से हराया और 5,12,552 वोट हासिल किए। इस जीत ने संकेत दिया कि बसपा के अलावा भी दलित राजनीति में नए नेतृत्व के लिए राजनीतिक अवसर मौजूद हैं।
हालांकि, लोकसभा चुनाव में मिली इस सफलता को पूरे उत्तर प्रदेश में व्यापक जनसमर्थन में बदलना चंद्रशेखर आजाद के सामने बड़ी चुनौती है। इसके लिए उन्हें मजबूत संगठन खड़ा करने, बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने और व्यापक सामाजिक समर्थन हासिल करने की जरूरत होगी। दलित समाज के एक वर्ग को उनसे उम्मीद है कि वह सामाजिक संघर्ष को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलकर सत्ता में भागीदारी का रास्ता मजबूत करेंगे।
उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की दिशा के लिहाज से 2027 का विधानसभा चुनाव अहम माना जा रहा है। बसपा अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के प्रयास में रहेंगी।
डेढ़ दशक से सत्ता से दूर दलित राजनीति के सामने अब नेतृत्व, संगठन और चुनावी समर्थन को नए सिरे से मजबूत करने की चुनौती है। चंद्रशेखर आजाद के लिए भी 2027 का चुनाव उनकी संसदीय जीत को प्रदेशव्यापी राजनीतिक प्रभाव में बदलने की परीक्षा होगा। वह दलित राजनीति को सत्ता के करीब ला पाएंगे या नहीं, इसका आकलन उनके संगठन की ताकत और चुनाव में मिलने वाले जनसमर्थन से होगा।

Manmohan, Chandauli (Uttar pradesh)
नाम: मनमोहन
पद: रिपोर्टर (प्रातः काल)
कार्यक्षेत्र: चंदौली (उत्तर प्रदेश)
बीट (मुख्य विषय): क्राइम (अपराध) और प्रशासन
मूलमंत्र: निष्पक्ष, बेबाक और तथ्यपरक पत्रकारिता
परिचय (About Manmohan)
मनमोहन उत्तर प्रदेश के चंदौली क्षेत्र के एक सजग, निडर और समर्पित पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातः काल' समाचार पत्र में रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मनमोहन मुख्य रूप से क्राइम (अपराध) और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मामलों को कवर करते हैं। उनका पत्रकारिता दृष्टिकोण पूरी तरह से "निष्पक्ष, बेबाक और तथ्यपरक" खबरों पर आधारित है, जिससे वे क्षेत्र की जनता के मुद्दों और प्रशासनिक सच्चाई को बिना किसी दबाव के सामने लाते हैं।
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एम.जे. (M.J. - Master of Journalism): मनमोहन पत्रकारिता में परास्नातक (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की डिग्री से योग्य हैं। उनकी यह उच्च प्रोफेशनल डिग्री और पत्रकारिता की सैद्धांतिक समझ उन्हें जटिल खबरों का तार्किक विश्लेषण करने और समाज के सामने एक जिम्मेदार मीडिया रिपोर्ट प्रस्तुत करने में सक्षम बनाती है।
