History of Shankaracharya Tradition : "हम शंकराचार्य हैं या नहीं, यह देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तय नहीं करेगा। यह अधिकार तो राष्ट्रपति के पास भी नहीं है।" प्रयागराज माघ मेले की रेती पर गूँजते ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ये शब्द केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस सहस्राब्दियों पुरानी आध्यात्मिक सत्ता की गर्जना है, जो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे से कहीं अधिक प्राचीन है। संगम के तट पर शाही स्नान को लेकर हुए विवाद ने एक बार फिर देश का ध्यान उस सर्वोच्च पद की ओर खींच लिया है, जिसे सनातन धर्म का 'सुप्रीम कोर्ट' माना जाता है।

विवाद की अग्नि: संगम तट पर क्या हुआ ?

माघ मेले के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव, मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम नोज पर स्नान को लेकर प्रशासन और शंकराचार्य के बीच ठन गई। प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जारी एक नोटिस के बाद जब पुलिस ने शंकराचार्य के रथ को रोका, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। शिष्यों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माइक थामकर सीधे देश के शीर्ष पदों—राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ—को संबोधित करते हुए शंकराचार्य पद की मर्यादा और स्वायत्तता का हवाला दिया। वर्तमान में, उन्होंने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अनशन शुरू कर दिया है, जिससे संत समाज में उबाल है।

शंकराचार्य: व्यक्ति नहीं, एक शाश्वत संस्था

आखिर एक संत लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों को चुनौती कैसे दे सकता है? इसका उत्तर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित उस व्यवस्था में है, जो 8वीं शताब्दी से भारत की दार्शनिक एकता को थामे हुए है। शंकराचार्य अद्वैत वेदांत परंपरा के वे सर्वोच्च आचार्य होते हैं, जिनका कार्य वेदों की व्याख्या करना और धर्म की रक्षा करना है।

सनातन के चार स्तंभ: चारों दिशाओं का धर्म-भूगोल

आदि शंकराचार्य ने भारत को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से जोड़ने के लिए चार दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी, जो आज भी सनातन धर्म के प्रकाश स्तंभ हैं:

  • श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण): कर्नाटक के तुंगा नदी तट पर स्थित, जो यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करता है।
  • गोवर्धन पीठ (पूर्व): ओडिशा के पुरी में स्थित, जो ऋग्वेद और जगन्नाथ संस्कृति का केंद्र है।
  • शारदा पीठ (पश्चिम): गुजरात के द्वारका में स्थित, जो सामवेद और वेदांत का प्रमुख केंद्र है।
  • ज्योतिर्मठ (उत्तर): उत्तराखंड के बद्रीनाथ में स्थित, जो अथर्ववेद और ज्ञान-वैराग्य की पीठ है।

चयन की जटिल प्रक्रिया और पद की गरिमा :

शंकराचार्य का पद न तो वंशानुगत है और न ही राजनीतिक। इसका चयन शास्त्र ज्ञान, वैराग्य और दशनामी संन्यास परंपरा के कठोर मानदंडों के आधार पर होता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि उन्हें द्वारका और श्रृंगेरी पीठ की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है, जो उन्हें धार्मिक रूप से स्वतंत्र और सर्वोच्च बनाती है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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