मेरठ में चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायालय ने बुधवार को अहम फैसला सुनाते हुए सौरभ की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा द्वितीय की अदालत ने दोनों को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने दोनों दोषियों पर अर्थदंड भी लगाया। न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अधर्म के काम पर सजा देना धर्म है और इस तरह की नृशंस हत्या में माफी स्वीकार नहीं की जा सकती।

सुरक्षा कारणों से जेल में बंद मुस्कान और साहिल को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अदालत से जोड़ा गया था। सजा सुनाए जाने के दौरान दोनों की आंखों से आंसू निकल पड़े। मृत्युदंड का ऐलान करने से पहले न्यायाधीश ने दोनों से उनकी अंतिम राय पूछी थी। मुस्कान रस्तोगी ने अपने अपराध पर पश्चाताप जताने के बजाय अपनी मासूम बच्चियों का हवाला देते हुए कहा, “मेरी बच्चियों का ख्याल रखा जाए।” इसके बाद वह खामोश हो गई। वहीं, साहिल अदालत के सवाल पर जड़ बना रहा और उसने कोई जवाब नहीं दिया।

अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों के अनुसार, सौरभ राजपूत की हत्या तीन मार्च 2025 को मेरठ में की गई थी। मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर पति को रास्ते से हटाने की साजिश रची थी। हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए दोनों ने सौरभ के शव के पांच टुकड़े किए और उन्हें नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में भर दिया। पकड़े जाने के डर से ड्रम में सीमेंट का घोल डालकर शव को उसमें जमा दिया गया था। मामला सामने आने के बाद इस हत्याकांड ने देशभर में लोगों को झकझोर दिया था।

अदालत का फैसला आने के बाद सौरभ राजपूत की बुजुर्ग मां भावुक हो गईं। कचहरी परिसर के बाहर उन्होंने भर्राई आवाज में कहा कि आज उन्हें सच्चा न्याय मिला है और उनके बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी। मेरठ कचहरी में वकीलों ने लड्डू बांटकर फैसले का स्वागत किया। वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण कुमार दुबे ने इसे महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला बताया। उनके अनुसार, इस फैसले से समाज में अपराधियों के बीच सख्त संदेश जाएगा।

मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बीबीजीटीएस मूर्ति ने मामले की सफल पैरवी और जांच के लिए संबंधित पुलिसकर्मियों की सराहना की। उन्होंने घोषणा की कि हत्याकांड की त्वरित जांच कर दोषियों को अंजाम तक पहुंचाने वाले अधिकारियों और सिपाहियों को प्रशस्ति पत्र तथा नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा।

जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) केके चौबे ने बताया कि मेरठ कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है, लेकिन मृत्युदंड की अंतिम पुष्टि की प्रक्रिया अभी बाकी है। नियमानुसार, करीब एक सप्ताह बाद फैसले को आधिकारिक पुष्टि के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा जाएगा। हाईकोर्ट से मृत्युदंड की पुष्टि होने के बाद दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प रहेगा। वहां से भी याचिका खारिज होने पर राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की जा सकती है। डीजीसी ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय से सजा बदलने अथवा राष्ट्रपति से दया मिलने की स्थिति में फांसी नहीं होगी। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में दो से तीन वर्ष या उससे अधिक समय लग सकता है।

मेरठ की चौधरी चरण सिंह जिला कारागार के इतिहास में भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने बताया कि यहां आखिरी बार वर्ष 1975 में मुजफ्फरनगर के करम सिंह को फांसी दी गई थी। उसके बाद से जेल में किसी को फांसी नहीं दी गई है। यदि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मुस्कान की मृत्युदंड की सजा बरकरार रहती है, तो वह मेरठ जेल में फांसी पाने वाली इतिहास की पहली महिला होगी। वहीं, साहिल को फांसी दिए जाने पर यह जेल में किसी पुरुष को मृत्युदंड दिए जाने का दूसरा मामला होगा। इससे पहले वर्ष 2014 में निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली को यहां फांसी देने की तैयारी की गई थी, लेकिन अंतिम समय में सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया रोक दी थी।

मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड सुनाने वाले जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा द्वितीय का न्यायिक अनुभव लगभग 23 वर्ष का है। उनका जन्म दो जुलाई 1971 को उत्तर प्रदेश के मऊ में हुआ था। उन्होंने बीए, एलएलबी और एलएलएम की शिक्षा प्राप्त की। 31 मई 2003 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में उन्होंने न्यायिक सेवा की शुरुआत की। अपने कार्यकाल के दौरान वह गाजीपुर, अलीगढ़, गोरखपुर, कानपुर और मिर्जापुर सहित कई संवेदनशील जिलों में तैनात रहे। नवंबर 2024 में वह मिर्जापुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने और 21 मई 2026 से मेरठ में सेवाएं दे रहे हैं।

सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत का मृत्युदंड संबंधी फैसला सुनाए जाने के बाद अब मामला सजा की न्यायिक पुष्टि और आगे की संभावित अपीलों की प्रक्रिया में पहुंचेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के समक्ष उपलब्ध कानूनी विकल्पों के बाद ही यह तय होगा कि दोनों दोषियों को सुनाई गई सजा अंतिम रूप से बरकरार रहती है या उसमें कोई बदलाव होता है।

Om Prakash Pal

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नाम: ओम प्रकाश पाल

वर्तमान पद: स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं स्तंभकार

कार्यक्षेत्र: नेशनल ब्यूरो (राष्ट्रीय स्तर)

बीट (मुख्य विषय): राजनीति, संसद, केंद्रीय मंत्रालय, कृषि, साहित्य, खेल एवं प्रशासन (बिजनेस को छोड़कर सभी विषयों पर कार्य)

पत्रकारिता अनुभव: लगभग 39 वर्ष

परिचय एवं अनुभव 

ओम प्रकाश पाल पिछले 39 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल ब्यूरो में विशेष संवाददाता के रूप में लगभग 20 वर्षों तक संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की रिपोर्टिंग की है।

एक मान्यता प्राप्त पत्रकार के रूप में उन्होंने केंद्रीय गृह, रक्षा, रेलवे, सड़क परिवहन, श्रम एवं रोजगार, जलशक्ति और कृषि जैसे प्रमुख केंद्रीय मंत्रालयों को कवर किया है।

विभिन्न समाचार पत्रों में योगदान:

  • अमर उजाला एवं दैनिक जागरण: पत्रकारिता के शुरुआती वर्षों का अनुभव।
  • शाह टाइम्स: न्यूज़ एडिटर (News Editor) के पद पर सेवाएं।
  • हरिभूमि (दिल्ली): वरिष्ठ संवाददाता के रूप में कार्य।

राजनीति विज्ञान और कृषि विषयों के जानकार होने के साथ-साथ उन्होंने साहित्य और खेल के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। वर्तमान में वह एक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और स्तंभकार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता 

  • स्नातक (Graduate)
  • B.Ed (बैचलर ऑफ एजुकेशन)
  • पत्रकारिता में डिप्लोमा (Diploma in Journalism)
  • साहित्य रत्न
  • कृषि विशारद

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