झारखंड की स्वर्णरेखा नदी में मिलता है सोना, रोज सैकड़ों लोग करते हैं कड़ी मेहनत
सरायकेला के चांडिल में रोजगार के अभाव में ग्रामीण लगातार शारीरिक कष्ट और अनिश्चित आय के बीच नदी की मिट्टी छानकर जीविका चलाने को मजबूर हैं।

एक बुजुर्ग महिला सरायकेला में स्वर्णरेखा नदी किनारे लकड़ी के सांचे से बालू धोती दिख रही है।
झारखंड की स्वर्णरेखा नदी अपने भीतर सोने के कण समेटे हुए है। यही वजह है कि इस नदी के किनारे रोजाना सैकड़ों लोग सोने की तलाश में जुटते हैं। घंटों की मेहनत और शारीरिक कष्ट के बाद कुछ लोगों के हाथ सोने के कण तो लगते हैं, लेकिन इनसे होने वाली कमाई इतनी कम होती है कि उनकी आमदनी महज कुछ सौ रुपये तक ही सीमित रह जाती है। सोने की तलाश में जुटे इन ग्रामीणों के लिए यह काम आजीविका का एक साधन है, जिसके साथ अनिश्चित कमाई और लगातार शारीरिक मेहनत जुड़ी हुई है।
रांची जिले के नगरी गांव में स्थित रानी चुआं से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली स्वर्णरेखा नदी लगभग 474 किलोमीटर की दूरी तय करती है। हालांकि, नदी का केवल एक हिस्सा ऐसा है, जहां लोगों को सोने के कण मिलते हैं। यह इलाका जमशेदपुर शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर पड़ोसी जिले सरायकेला-खरसावां के चांडिल ब्लॉक में स्वर्णरेखा नदी के किनारे स्थित है। यहां नदी के किनारे कई स्थानों पर ग्रामीण बहकर आई बालू और मिट्टी से सोने के कण निकालकर वर्षों से अपनी जीविका चलाते आ रहे हैं।
इन स्थानों में गौरी गांव भी शामिल है। इसके 20 किलोमीटर के दायरे में फैले दर्जनों गांवों के ग्रामीण हर सुबह सैकड़ों की संख्या में नदी के तट पर पहुंचते हैं। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता दुखु महाली के मुताबिक, लगभग पांच सौ ग्रामीणों के लिए सोने के ये कण आजीविका का साधन हैं।
आदिवासी बहुल इस इलाके में कुछ लोग आजीविका के लिए सब्जियों की खेती पर निर्भर हैं। वहीं, जिन लोगों के पास खेत नहीं हैं और रोजगार का कोई दूसरा साधन उपलब्ध नहीं है, वे सोने के कण निकालने के काम में जुट जाते हैं। दुखु महाली बताते हैं कि सोने के इन कणों की चमक के पीछे अत्यधिक शारीरिक कष्ट और अनिश्चित आय का लंबा और दर्दनाक सिलसिला छिपा है।
सोना निकालने का काम देखने में जितना सहज लगता है, वास्तविकता में उतना ही मुश्किल है। कड़ी धूप में नदी के किनारे बने गड्ढों में घुटनों के बल झुककर घंटों तक मिट्टी धोनी पड़ती है। लगातार एक ही स्थिति में काम करने और मिट्टी से सोने के कण अलग करने की यह प्रक्रिया शरीर को बुरी तरह थका देती है।
पुड़िसिली गांव की 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला ढांगी सरदार वर्षों से इस काम में लगी हुई हैं। जब उनसे मुलाकात हुई, तब वह जामुन की लकड़ी से बने गहरे सूपनुमा सांचे में रखी मिट्टी से सोने के कण अलग करने की कठिन प्रक्रिया में जुटी थीं।
ढांगी सरदार बताती हैं, "मिट्टी जब खोदकर इस सूपनुमा सांचे में डालते हैं, थोड़ा हिलाते हैं, तब अंत में एक-दो कण धुलकर सोना मिलता है।"
सोने के कण निकालने के लिए लकड़ी के आयताकार सांचे का इस्तेमाल किया जाता है, जो बीच में हल्का गहरा होता है। इसमें मिट्टी और बालू डालकर पानी के बहाव के साथ सांचे को हिलाया जाता है। इस प्रक्रिया में हल्की मिट्टी और बालू बह जाती है, जबकि सोना भारी होने के कारण बर्तन के नीचे या तली में बैठ जाता है। इसी तरह काफी मेहनत के बाद सोने के छोटे-छोटे कण अलग किए जाते हैं।
दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद जब ग्रामीण शाम को अपने घर लौटते हैं, तो उनके शरीर का हर हिस्सा दर्द से कराह रहा होता है। सोने के कण निकालने के लिए लगातार झुककर काम करने का असर उनके पैरों, पीठ और हाथों पर पड़ता है।
ढांगी सरदार अपनी परेशानी बताते हुए कहती हैं, "बहुत दर्द रहता है, पैर में, पीठ में, हाथ में। दवा खाते हैं, तब ठीक होता है।"
स्वर्णरेखा नदी के किनारे बसे गांवों में सोने के कण निकालने का यह काम उन ग्रामीणों की आजीविका से जुड़ा है, जिनके पास खेती या रोजगार का दूसरा साधन नहीं है। दिनभर की मेहनत के बावजूद उन्हें सोने के कुछ ही कण मिल पाते हैं और कमाई भी कुछ सौ रुपये तक सीमित रहती है। सोने की तलाश में नदी की मिट्टी छानते इन ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी में मेहनत, शारीरिक पीड़ा और अनिश्चित आय एक साथ जुड़ी हुई हैं।

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