जनता मालिक, अधिकारी जनसेवक या सरकारी दफ्तरों में आज भी कायम है अंग्रेजों वाली अफसरशाही?
लोकतंत्र में जनता मालिक और अधिकारी जनसेवक हैं, लेकिन सरकारी दफ्तरों में आम नागरिकों को घंटों इंतजार और उपेक्षा का सामना क्यों करना पड़ता है? आजादी के 79 साल बाद भी अफसरशाही की मानसिकता पर उठ रहे सवालों को जानिए।

सरकारी कार्यालयों में समस्याओं के समाधान के लिए कतार में खड़े और इंतजार करते आम नागरिक.
लोकतंत्र में जनता को सर्वोपरि माना गया है और सरकारी अधिकारियों को जनसेवा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके बावजूद सरकारी दफ्तरों में अपनी समस्याओं का समाधान तलाशने पहुंचने वाले आम नागरिकों को कई बार घंटों इंतजार और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आजादी के 79 साल बाद भी सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजों के दौर की अफसरशाही वाली मानसिकता क्यों दिखाई देती है?
जरा किसी बड़े सरकारी कार्यालय का नजारा देखिए। बाहर तपती धूप में लोग हाथों में फाइलें लेकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते हैं। उनके चेहरों पर परेशानी साफ दिखाई देती है। दूसरी ओर अधिकारी का कमरा वातानुकूलित होता है। बाहर सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं और अर्दली की अपनी अलग हुकूमत नजर आती है। अपनी समस्या लेकर पहुंचे फरियादी को अधिकारी से मिलने की कोशिश करने पर अक्सर जवाब मिलता है, 'साहब अभी व्यस्त हैं, बाद में आइए।'
कई बार आम नागरिक को यह भी पता नहीं चल पाता कि अपनी ही समस्या का समाधान कराने के लिए उसे किन-किन अधिकारियों और कार्यालयों के चक्कर लगाने होंगे। सुबह से अपना काम-धंधा छोड़कर सरकारी दफ्तर पहुंचे व्यक्ति को घंटों इंतजार के बाद भी अधिकारी से मिलने का मौका नहीं मिलता। ऐसे में उसे अपॉइंटमेंट लेकर आने की सलाह दे दी जाती है। यह स्थिति व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है कि आखिर सरकारी कार्यालय किसके लिए बनाए गए हैं?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी पद किसी व्यक्ति को शासक नहीं, बल्कि जिम्मेदार जनसेवक बनाता है। अधिकारी की कुर्सी जनता की समस्याएं सुनने और उनका समाधान करने की जिम्मेदारी का प्रतीक है। इसका उद्देश्य किसी आम नागरिक को अपने सामने छोटा महसूस कराना नहीं है।
विडंबना यह है कि जनता के टैक्स से संचालित सरकारी व्यवस्था में उसी जनता को अपने काम के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक ओर सरकारी सुविधाओं और संसाधनों से सुसज्जित अधिकारियों के कार्यालय हैं, वहीं दूसरी ओर छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए परेशान होते आम नागरिक हैं।
यह सवाल अधिकारियों को मिलने वाली सुविधाओं या उनके पद की गरिमा पर नहीं, बल्कि उनके उस व्यवहार पर है, जिससे आम नागरिक को सम्मान के बजाय उपेक्षा का एहसास होता है। सरकारी पद की गरिमा बनाए रखने के साथ जनता के प्रति जवाबदेही निभाना भी प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अंग्रेजी शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य सत्ता और राजस्व पर नियंत्रण बनाए रखना था। आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन की भूमिका बदलकर जनसेवा और जनकल्याण की हो गई। इसके बावजूद कुछ सरकारी कार्यालयों में आज भी औपनिवेशिक मानसिकता की झलक दिखाई देती है।
कलेक्टर से लेकर तहसील स्तर तक के अधिकारियों की जिम्मेदारी जनता की समस्याओं को सुनना और उनका समयबद्ध समाधान कराना है। किसी नागरिक को सम्मान देना अधिकारी की कृपा नहीं, बल्कि उसके प्रशासनिक दायित्व का हिस्सा है।
यह भी सच है कि अधिकारियों के पास महत्वपूर्ण बैठकें, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और काम का भारी दबाव रहता है। लेकिन प्रशासनिक व्यस्तता के नाम पर किसी आम नागरिक की शिकायत को अनिश्चितकाल तक टालना उचित नहीं ठहराया जा सकता। नागरिकों की समस्याएं सुनने और उनके समाधान की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान न होना पड़े।
सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली में बदलाव तभी दिखाई देगा, जब वहां पहुंचने वाले प्रत्येक नागरिक को सम्मान मिले। अपनी समस्या रखने के लिए किसी को सिफारिश या पहचान की जरूरत न पड़े और अधिकारी अपनी कुर्सी को अधिकार के बजाय जिम्मेदारी समझें। यही सुशासन की उस भावना का आधार है, जिसमें जनता की समस्याओं का समाधान प्रशासन की प्राथमिकता होती है।
याद रखना होगा कि अधिकारी जनता के मालिक नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह लोकसेवक हैं। सरकारी कुर्सी की असली ताकत उसके रुतबे में नहीं, बल्कि उससे होने वाली जनसेवा में है। लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी ताकत है और सरकारी व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए उस आवाज का उठना जरूरी है।
इसी संदर्भ में आम नागरिकों से भी सवाल है कि क्या उन्होंने कभी किसी सरकारी कार्यालय में घंटों इंतजार करने, अधिकारी से मुलाकात नहीं हो पाने या बिना काम कराए वापस लौटने का अनुभव किया है? यदि हां, तो अपने अनुभव साझा करना जरूरी है, ताकि सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली और आम जनता को होने वाली परेशानियों पर चर्चा हो सके।

अनूप शर्मा
नाम: अनूप शर्मा
पद: स्टाफ रिपोर्टर (Staff Reporter)
कार्यक्षेत्र: खुर्जा एवं आसपास का क्षेत्र (उत्तर प्रदेश)
बीट (मुख्य विषय): सभी प्रकार के समाचार (जनहित के मुद्दे, स्थानीय समाचार और सामाजिक विषय)
परिचय: अनूप शर्मा एक सक्रिय पत्रकार एवं लेखक हैं। वह जनहित से जुड़े मुद्दों, स्थानीय समाचारों और सामाजिक विषयों को प्रमुखता से अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने रखते हैं। वर्तमान में वह खुर्जा और आसपास के क्षेत्र से समाचारों का संकलन एवं प्रकाशन करते हैं। निष्पक्षता और सामाजिक सरोकारों के साथ जमीनी खबरों को पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की मुख्य पहचान है।
पत्रकारिता का अनुभव: अनूप शर्मा को मीडिया और प्रिंट प्रकाशन में कार्य करने का अच्छा अनुभव है: UP Police Monitor Magazine: पिछले 4 वर्षों से मासिक पत्रिका में स्टाफ रिपोर्टर के रूप में कार्यरत। The हिंद न्यूज 24: वर्ष 2026 की शुरुआत से रिपोर्टर के पद पर कार्यरत। प्रातःकाल: सितंबर 2026 से निरंतर जुड़े हुए हैं।
शैक्षणिक योग्यता (Education)वाणिज्य में स्नातकोत्तर (M.Com)
