कुत्ते के काटने पर 2 इंजेक्शन लगवाए और छोड़ दिया कोर्स, अब 4 महीने बाद कुत्ते की तरह व्यवहार करने लगा मासूम...
मिर्जापुर के विंध्याचल में रेबीज के अधूरा टीकाकरण के कारण एक मासूम बच्चे की हालत गंभीर हो गई है। कुत्ते के काटने के 4 महीने बाद उभरे लक्षणों ने हाइड्रोफोबिया और हिंसक व्यवहार का डरावना मंजर पैदा कर दिया है। डॉक्टरों के अनुसार अब बच्चे का बचना नामुमकिन है। जानिए रेबीज के पीछे का विज्ञान और टीकाकरण के प्रति लापरवाही के घातक परिणामों की यह पूरी रिपोर्ट।

मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित विंध्याचल इलाके से एक अत्यंत हृदयविदारक और झकझोर देने वाला मामला प्रकाश में आया है, जो रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी और टीकाकरण के प्रति बरती गई घोर लापरवाही की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है। यह घटना उस समय शुरू हुई जब करीब 4 महीने पहले एक गांव के मासूम बच्चे को आवारा कुत्ते ने अपना शिकार बनाया था। उस वक्त परिवार बच्चे को अस्पताल तो ले गया, लेकिन जागरूकता के अभाव या "बच्चा अब ठीक दिख रहा है" की घातक सोच के चलते इलाज अधूरा छोड़ दिया गया। निर्धारित 5 इंजेक्शनों के पूर्ण कोर्स के बजाय बच्चे को रेबीज वैक्सीन के केवल दो इंजेक्शन लगवाए गए, जो अंततः उसके लिए काल बन गए।
मार्च 2026 की शुरुआत होते ही बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी और उसमें रेबीज के वे लक्षण उभरने लगे जो किसी भी इंसान की रूह कंपा दें। बच्चे को तेज बुखार के साथ ही पानी पीने से भीषण खौफ लगने लगा, जिसे चिकित्सा विज्ञान में 'हाइड्रोफोबिया' (Hydrophobia) कहा जाता है। धीरे-धीरे उसका व्यवहार पूरी तरह हिंसक हो गया और वह आस-पास के लोगों पर झपटने लगा। गले की मांसपेशियों में आए खिंचाव और पैरालिसिस के कारण उसकी आवाज इतनी भारी और विकृत हो गई कि उसे सुनने वाले लोग 'कुत्ते की तरह भौंकना' करार दे रहे हैं।
इस मामले पर डॉक्टरों का रुख स्पष्ट और बेहद दुखद है; उन्होंने साफ कर दिया है कि एक बार लक्षण दिखने के बाद इस बच्चे के बचने की उम्मीद लगभग शून्य है। रेबीज को दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में गिना जाता है क्योंकि जैसे ही इसके लक्षण जैसे व्यवहार परिवर्तन या पानी से डर दिखना शुरू होता है, मरीज की मृत्यु निश्चित हो जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अधूरा टीकाकरण कोर्स मौत को निमंत्रण देने जैसा है, क्योंकि 2 डोज शरीर में पर्याप्त एंटीबॉडी बनाने में सक्षम नहीं होतीं और तब तक घातक वायरस नसों के जरिए मस्तिष्क तक अपनी पहुंच बना चुका होता है।
जिसे स्थानीय लोग अंधविश्वास के चलते 'कुत्ते का अंश' मान रहे हैं, उसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक कारण मौजूद है। रेबीज वायरस सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम (CNS) पर प्रहार करता है, जिससे मस्तिष्क में सूजन यानी एन्सेफलाइटिस (Encephalitis) पैदा होती है। यही कारण है कि मरीज अपना मानसिक संतुलन खोकर उग्र व्यवहार करने लगता है। साथ ही, वायरस गले की नसों और वोकल कॉर्ड्स को इस कदर प्रभावित करता है कि मरीज कुछ भी निगलने में असमर्थ हो जाता है और बोलने के प्रयास में उसके मुख से निकलने वाली फटी हुई आवाज किसी कुत्ते के भौंकने जैसी प्रतीत होती है।
यह दुखद घटना पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि रेबीज का कोई इलाज नहीं, बल्कि केवल बचाव ही एकमात्र रास्ता है। किसी भी पशु के काटने पर तत्काल साबुन और बहते पानी से 15 मिनट तक घाव को धोना और डॉक्टर द्वारा निर्धारित 0, 3, 7, 14 और 28वें दिन के सभी 5 इंजेक्शनों का कोर्स पूरा करना अनिवार्य है। मिर्जापुर की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि घाव चाहे छोटा हो या कुत्ता पालतू, टीकाकरण में की गई छोटी सी भी लापरवाही का परिणाम केवल और केवल दर्दनाक मौत है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
