फलासिया/उदयपुर। दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल में बहने वाली वांकल नदी अपने स्वच्छ जल, हरित तटों और पहाड़ी भू-आकृतियों के कारण क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है। यह नदी प्राचीन अरावली पर्वतमाला की गोद से निकलकर आसपास के गांवों और वन क्षेत्रों को सिंचित करती हुई प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती है।

जैव विविधता और पारिस्थितिक विरासत

वांकल नदी का अपवाह क्षेत्र फुलवारी की नाल वन्यजीव अभयारण्य से जुड़ा हुआ है, जो जैव विविधता, दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की पहाड़ियां, झरने, घने वन और शांत वातावरण पर्यटकों, प्रकृति प्रेमियों एवं शोधकर्ताओं को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। वर्षा ऋतु में यह क्षेत्र अद्भुत प्राकृतिक छटा से भर उठता है। यह क्षेत्र न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक और पारिस्थितिक विरासत का भी अनमोल धरोहर है।

पर्यटन विकास और रोजगार की संभावनाएं

पर्यावरण प्रेमी धनराज गरासिया ने बताया कि "टीलेश्वर मुक्तिधाम आश्रम, भोलेश्वर महादेव मंदिर, राम कुंडा, लंगोटिया, खांचण पुल, कूकड़ी माता जी, नगाधिराज बावजी, रीछ पहाड़ियां, कटावली झरना एवं भांडेर बावजी झरना जैसे धार्मिक एवं प्राकृतिक स्थलों का समुचित विकास किया जाए तो क्षेत्र में सतत पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है।" उनका मानना है कि इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे।

सरकार से ठोस पहल का आग्रह

उन्होंने जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी से आग्रह किया कि "वन विभाग एवं जनजाति विभाग के माध्यम से विकास प्रस्ताव स्वीकृत कर क्षेत्र के समग्र विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं आजीविका सशक्तिकरण की दिशा में ठोस पहल की जाए।" स्थानीय जनता द्वारा प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण एवं विकास हेतु मांग लगातार उठाई जा रही है। जिससे भविष्य में आदिवासी अंचल में बहने वाली वांकल नदी और अरावली की पहाड़ियों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।

Pratahkal Bureau

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