दस लक्षण धर्म की यात्रा के चतुर्थ दिवस का केंद्र उत्तम शौच धर्म है, जो बाहरी स्वच्छता से आगे बढ़कर मन की निर्मलता का संदेश देता है। जैन दर्शन में शौच का अर्थ केवल शरीर, वस्त्र या घर की स्वच्छता नहीं, बल्कि मन में जमा लोभ, तृष्णा, ईर्ष्या, कपट, अहंकार और ममत्व जैसे विकारों को दूर करना है।

उत्तम शौच मनुष्य को भीतर झाँकने का अवसर देता है और यह प्रश्न सामने रखता है कि जिस शरीर को हम प्रतिदिन स्वच्छ करते हैं, क्या उसके भीतर रहने वाले मन को भी हमने कभी स्वच्छ किया है। मन में जमा यही विकार आत्मा की निर्मलता को ढकने वाला वास्तविक मैल माने गए हैं।

पूजन में कहा गया है, “उत्तम शौच लोभ परिहारी। संतोषी गुण रतन भंडारी॥” इस भाव में उत्तम शौच का पहला संकेत लोभ का परिहार बताया गया है। लोभ हटते ही संतोष का गुण भीतर प्रकट होता है। मनुष्य के पास कितना है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके मन में और कितना पाने की इच्छा बनी हुई है।

धन बढ़ता जाए, लेकिन चाहत भी बढ़ती जाए तो मन कभी समृद्ध नहीं होता। सुविधाएँ बढ़ती रहें, लेकिन संतोष न आए तो जीवन सुखी नहीं होता। सम्मान मिलता रहे, लेकिन और सम्मान की भूख बनी रहे तो मन तृप्त नहीं होता। लोभ की प्रवृत्ति मनुष्य से लगातार कहती रहती है, “बस थोड़ा और...” और यह “थोड़ा और” कभी समाप्त नहीं होता।

एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म लेती है। एक उपलब्धि मिलती है तो अगली उपलब्धि की चिंता शुरू हो जाती है। एक वस्तु घर में आती है तो दूसरी वस्तु की आवश्यकता महसूस होने लगती है। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन जाती है कि मनुष्य वस्तुओं को नहीं, बल्कि वस्तुएँ मनुष्य को पकड़ लेती हैं।

उत्तम शौच इसी पकड़ को ढीला करने की प्रेरणा देता है। यह संसार छोड़ने का उपदेश नहीं देता, बल्कि संसार की वस्तुओं के बीच रहते हुए उनके प्रति अनावश्यक ममत्व छोड़ने का भाव जगाता है। धन हो, लेकिन धन का लोभ न हो। सम्मान हो, लेकिन सम्मान की भूख न हो। साधन हों, लेकिन साधनों का अहंकार न हो। संपत्ति हो, लेकिन संपत्ति मन की संपत्ति न बन जाए। यही उत्तम शौच की वास्तविक साधना है।

संतोष का अर्थ प्रगति रोक देना नहीं है। संतोष का अर्थ है प्रयास पूरी शक्ति से करना, लेकिन परिणाम और संग्रह को मन की शांति से बड़ा न बनने देना। जिस मन में संतोष होता है, वह अभाव में भी मुस्करा सकता है, जबकि लोभ से भरा मन वैभव के बीच भी बेचैन रह सकता है।

इसीलिए पूजन की दूसरी पंक्ति “संतोषी गुण रतन भंडारी” संतोषी व्यक्ति की आंतरिक संपन्नता को सामने रखती है। संसार की दृष्टि से उसके पास भले ही कम हो, लेकिन उसके भीतर गुणों के रत्नों का भंडार होता है। वह दूसरों की वस्तु देखकर नहीं जलता, दूसरों की सफलता देखकर दुखी नहीं होता, हर उपलब्धि को अहंकार का कारण नहीं बनाता और अपने जीवन को तुलना की तराजू पर नहीं तौलता।

उसका भाव होता है, “जो मिला, वह पर्याप्त है; जो नहीं मिला, उसके लिए व्यर्थ अशांत क्यों रहूँ?” यही भाव धीरे-धीरे आत्मा को निर्मल करता है।

उत्तम शौच के चतुर्थ दिवस पर मनुष्य को अपने घर की अलमारियों के साथ अपने मन की अलमारी भी खोलने का संदेश दिया गया है। आत्मचिंतन में यह देखना आवश्यक है कि कहीं वर्षों पुराना लोभ तो नहीं रखा, किसी के प्रति ईर्ष्या तो नहीं रखी, किसी वस्तु का अनावश्यक मोह तो नहीं रखा, प्रशंसा पाने की भूख तो नहीं रखी या अपनी बात मनवाने का आग्रह तो नहीं रखा।

यदि ऐसा कुछ मिले तो उसे निकाल फेंकने का संकल्प लेने की प्रेरणा दी गई है। मन की सफाई एक दिन में नहीं होती, बल्कि यह प्रतिदिन की साधना है। जैसे घर में प्रतिदिन झाड़ू लगती है, वैसे ही मन में भी प्रतिदिन आत्मचिंतन की झाड़ू लगनी चाहिए। लोभ की धूल हटने के बाद ही संतोष का प्रकाश दिखाई देता है।

उत्तम शौच धर्म के दिन जीवन में छोटा-सा परिवर्तन करने का संदेश भी दिया गया है। आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझना, संग्रह और लोभ में अंतर समझना, सुविधा और आसक्ति में अंतर समझना तथा प्रगति और तृष्णा में अंतर समझना जरूरी बताया गया है।

जो हमारे पास है, उसके लिए कृतज्ञ रहने और जो नहीं है, उसके लिए व्यर्थ व्याकुल न होने का भाव रखने की प्रेरणा दी गई है। साथ ही जो मिले, उसका उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित में करने का भाव रखने का संदेश दिया गया है।

अंततः मनुष्य के साथ उसकी संपत्ति, संग्रह की मात्रा, पद और प्रतिष्ठा नहीं जाते। साथ जाता है उसका भाव, उसके कर्म और उसकी आत्मिक निर्मलता। उत्तम शौच धर्म का संदेश इसी आत्मिक शुद्धि की ओर संकेत करता है—लोभ से दूरी और संतोष से निकटता के माध्यम से मन को निर्मल बनाना और आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर लौटने देना।

गुरुमंत्र में कहा गया है, “जिस दिन ‘और चाहिए’ समाप्त होकर ‘जो मिला, वह पर्याप्त है’ का भाव जाग जाएगा, उस दिन मन की मलिनता मिटने लगेगी। लोभ से दूरी और संतोष से निकटता—यही उत्तम शौच की सच्ची साधना है।”

Dharnendra Jain( Kherwara)

Dharnendra Jain( Kherwara)

नाम: धरणेन्द्र जैन

वर्तमान पद: सीनियर रिपोर्टर (प्रातः काल दैनिक, खेरवाड़ा विधानसभा)

कार्यक्षेत्र: खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र (खेरवाड़ा, ऋषभदेव, और नयागांव उपखंड क्षेत्र, जिला उदयपुर, राजस्थान)

बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, प्रशासन सहित सभी क्षेत्रों की खबरें

अनुभव: 30 वर्ष से अधिक

परिचय 

धरणेन्द्र जैन उदयपुर जिले के खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के एक अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातः काल दैनिक' में सीनियर रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वह मुख्य रूप से खेरवाड़ा, ऋषभदेव और नयागांव उपखंड क्षेत्र को कवर करते हैं। धरणेन्द्र जैन राजनीति, क्राइम, स्थानीय प्रशासन सहित क्षेत्र के सभी प्रमुख विषयों पर नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)

धरणेन्द्र जैन को पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों (30 वर्ष) से अधिक का व्यापक और लंबा अनुभव है:

  • वह साल 1995 से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर कार्यरत हैं।
  • उन्होंने वर्ष 1998 से 2018 तक लगातार 20 वर्षों तक 'दैनिक भास्कर' में खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के लिए सीनियर रिपोर्टिंग की है।
  • वर्ष 2018 से वह लगातार 'प्रातः काल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र की कमान संभाल रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।

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