उदयपुर से उठी गूंज: यूजीसी विनियम 2026 पर गहराया विवाद, पूर्व विधायक जोशी ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
उदयपुर के वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मनारायण जोशी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर यूजीसी एक्ट 2026 पर पुनर्विचार की मांग की है। जोशी ने चेतावनी दी है कि इस विनियम के कारण फर्जी शिकायतों और निर्दोषों के उत्पीड़न का खतरा बढ़ गया है, जिससे सामाजिक समरसता बिगड़ सकती है। पढ़ें, उच्च शिक्षा में समानता के नाम पर आए इस नए कानून पर क्यों मचा है घमासान।

उदयपुर। शिक्षा जगत में सामाजिक समरसता और समानता के दावों के बीच 'यूजीसी विनियम 2026' को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसकी तपिश अब प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँच चुकी है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और उदयपुर के पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी ने इस कानून के भविष्य में होने वाले घातक परिणामों को भांपते हुए सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर इस पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई है। जोशी का तर्क है कि जिस उद्देश्य के साथ इस अधिनियम को लाने की मंशा जताई गई है, धरातल पर उसके दुरुपयोग की आशंकाएं उससे कहीं अधिक प्रबल और भयावह नजर आ रही हैं।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्द्धन) विनियम 2026 के लागू होते ही अकादमिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक अनिश्चितता और अविश्वास का माहौल व्याप्त हो गया है। धर्मनारायण जोशी ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि हालांकि इस विनियम का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रहित वातावरण और समान अवसर सुनिश्चित करना रहा होगा, लेकिन इसकी आड़ में फर्जी शिकायतों का सैलाब आने का डर सता रहा है। उन्होंने आगाह किया कि कानूनी प्रावधानों और पदों के दुरुपयोग का इतिहास गवाह रहा है कि कैसे निर्दोष व्यक्तियों को मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और वहां कार्यरत कार्मिकों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। जोशी ने अपने पत्र के माध्यम से सरकार को सचेत किया है कि इस विनियम के प्रावधान कहीं सामाजिक सौहार्द्र पर आघात करने वाले तत्वों के लिए हथियार न बन जाएं। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि कानून के सभी पक्षों की सूक्ष्मता से समीक्षा की जाए ताकि किसी भी 'सफेदपोश' षड्यंत्रकारी के मंसूबे पूरे न हो सकें। यह पत्र न केवल एक राजनीतिक विरोध है, बल्कि उन हजारों निर्दोषों की चिंता का प्रतिबिंब भी है जो भविष्य में फर्जी शिकायतों के जाल में फंस सकते हैं। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस गंभीर चेतावनी के बाद यूजीसी के इस नए विवादित अध्याय पर क्या रुख अपनाती है।

