उदयपुर। आर्थिक लेन-देन में भरोसे का प्रतीक माना जाने वाला चेक, जब धोखाधड़ी का माध्यम बन जाए तो कानून भी सख्त हो जाता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया उदयपुर की अदालत से, जहां विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एनआई एक्ट केस क्रम-1) की पीठासीन अधिकारी मीनाक्षी चौधरी ने एक आरोपी को चेक अनादरण के मामले में छह माह के कारावास और 35 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

मामला चारभुजा मंदिर के पास मनवाखेड़ा निवासी नारायण पुत्र देवा डांगी द्वारा दायर परिवाद से जुड़ा है। फरियादी ने बताया कि उसकी आरोपी लोगर पुत्र कूका डांगी से आपसी जान-पहचान थी। आरोपी प्रॉपर्टी का व्यवसाय करता था और इस भरोसे में फरियादी ने उसे समय-समय पर कुल 25 लाख रुपये उधार दिए थे। राशि की अदायगी के एवज में आरोपी ने 18 फरवरी 2022 का चेक दिया, जो 22 फरवरी को बैंक से “अपर्याप्त राशि” के कारण अनादरित हो गया।

फरियादी के अधिवक्ता सुशील कोठारी ने अदालत में दलील दी कि आरोपी को नोटिस भेजे जाने के बावजूद उसने राशि लौटाई नहीं। इसके बाद न्यायालय में चेक अनादरण अधिनियम की धारा 138 के तहत परिवाद दर्ज किया गया। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने आरोपी लोगर डांगी को दोषी पाया।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आरोपी का यह कृत्य न केवल वित्तीय अनुशासन के विरुद्ध है, बल्कि समाज में आर्थिक विश्वास की जड़ें कमजोर करने वाला भी है। इसी आधार पर न्यायालय ने उसे छह माह के सश्रम कारावास और 35 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई, जिसमें से अधिकांश राशि फरियादी को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।

इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि उधारी के मामलों में चेक की विश्वसनीयता से खिलवाड़ करने वालों के प्रति न्यायालय किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगा।

Pratahkal Bureau

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