उदयपुर: इतिहास के अकादमिक विमर्शों पर सुखाड़िया विवि में कार्यशाला संपन्न
सुखाड़िया विश्वविद्यालय और माणिक्यलाल वर्मा शोध संस्थान द्वारा आयोजित कार्यशाला में जनजातीय गौरव और इतिहास के पुनर्लेखन पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।

उदयपुर। वर्तमान युग शस्त्रों की अपेक्षा शास्त्रों का युग है, जहाँ वास्तविक संघर्ष सीमाओं के बाहर जन-मानस के मस्तिष्क में लड़े जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में अकादमिक जगत का यह प्राथमिक दायित्व है कि वे राष्ट्र की सामूहिक चेतना एवं अस्मिता के विरुद्ध इतिहास में रचे गए सुनियोजित षड्यंत्रों को ध्वस्त करें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक सशक्त माध्यम के रूप में इन भ्रामक विमर्शों का खंडन कर राष्ट्र की वास्तविक छवि को प्रतिष्ठित करने में निर्णायक भूमिका निभा रही है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय एवं माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में राज्य सरकार की 'सौंध माटी' योजना के अंतर्गत 'जनजाति आस्था स्थल' विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के समापन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. डागा ने यह उद्बोधन दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने जनजातीय समाज के देवलोक और उनकी सनातन संस्कृति से जुड़ी आध्यात्मिक परंपराओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज नियोजित द्वेष अथवा भाषा के गलत प्रयोग से सामाजिक सद्भाव को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अकादमिक अनुसंधान एवं लेखन के दौरान न केवल शोधकर्ता का भाव पवित्र होना चाहिए, अपितु भाषा का चयन भी अत्यंत सटीक एवं विवेकपूर्ण होना अनिवार्य है, ताकि किसी प्रकार का विद्वेष उत्पन्न न हो।
कार्यशाला के संयोजक डॉ. बालू दान बारहठ ने बताया कि राजस्थान सरकार की बजट घोषणा की अनुपालना में जनजाति विकास विभाग द्वारा यह महत्वपूर्ण दायित्व विश्वविद्यालय को सौंपा गया था। समापन समारोह में प्रो. दिग्विजय भटनागर, डॉ. कुंजन आचार्य, डॉ. पी. एस. राजपूत, मगन जोशी एवं नारायण लाल सालवी सहित विभिन्न संकाय सदस्य, शोधार्थी तथा प्रतिभागी उपस्थित रहे। अकादमिक विमर्शों के माध्यम से इतिहास की पुनर्लेखन प्रक्रिया और जनजातीय गौरव को मुख्यधारा में स्थापित करने के संकल्प के साथ यह कार्यशाला संपन्न हुई।

