माहेश्वरी सेवासदन उदयपुर: नानी बाई को मायरो कथा का समापन
उदयपुर में आयोजित तीन दिवसीय कथा के समापन पर पं. मिथिलेश नागर ने भक्ति और समर्पण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए नरसी मेहता के प्रसंग का वर्णन किया।

उदयपुर। माहेश्वरी परिवार द्वारा माहेश्वरी सेवासदन में आयोजित तीन दिवसीय 'नानी बाई को मायरो' कथा का मंगलवार को भक्तिमय वातावरण में समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन कथावाचक डॉ. पं. मिथिलेश नागर ने भगवान द्वारिकाधीश द्वारा श्यामल सेठ के रूप में नानी बाई का मायरा भरने के प्रसंग का अत्यंत करुण और मार्मिक वर्णन किया। इस भावपूर्ण प्रस्तुति ने पंडाल में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को द्रवित कर दिया और पूरा वातावरण भगवान द्वारिकाधीश के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। पं. नागर ने अपने प्रवचन के माध्यम से सनातन धर्म और संपूर्ण मानव जाति को संदेश दिया कि यदि मन में अटूट विश्वास, आस्था, दृढ़ संकल्प, त्याग और समर्पण का भाव हो, तो लक्ष्य प्राप्ति असंभव नहीं है। उन्होंने कहा कि "कर लिया सो काम और भज लिया सो नाम", अतः मनुष्य को ईश्वर की भक्ति को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि भक्ति के मार्ग से ही मंजिल की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।
कथा का मुख्य प्रसंग नरसी मेहता की पुत्री नानी बाई के यहां उसकी पुत्री के विवाह के अवसर से जुड़ा था। परंपरा के अनुसार, ससुराल पक्ष द्वारा पीहर में मायरे का निमंत्रण भेजने का निर्णय लिया गया। नानी बाई की सास और ननंद, जो भक्त शिरोमणि नरसी मेहता की आर्थिक स्थिति को लेकर उनका उपहास उड़ाते थे, ने जानबूझकर एक अत्यंत भारी-भरकम मायरे की सूची तैयार करवाई। इस सूची में सोना, चांदी, वस्त्र, आभूषण, धन-दौलत और अनेक प्रकार की महंगी सामग्री शामिल की गई। यह निमंत्रण पत्रिका जब जूनागढ़ में नरसी मेहता के पास पहुंची, तो उन्होंने पूर्ण समर्पण के साथ उसे स्वीकार किया। कथावाचक ने बताया कि किस प्रकार भक्त की पुकार सुनकर स्वयं प्रभु ने श्यामल सेठ का रूप धारण कर मायरा भरा। यह प्रसंग भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना, जिन्होंने इस कथा के माध्यम से भक्ति की शक्ति और ईश्वर की अपने भक्तों के प्रति करुणा का अनुभव किया।

