उदयपुर में श्रद्धा का महाकुंभ: जगद्गुरु वसंत विजयानन्द गिरी महाराज के सानिध्य में एकलिंगनाथ की महिमा के साथ नूतन वर्ष का भव्य शंखनाद
उदयपुर के मीरा नगर में जगद्गुरु वसंत विजयानन्द गिरी महाराज के सानिध्य में हजारों श्रद्धालुओं ने एकलिंगजी शिव पुराण कथा और महालक्ष्मी यज्ञ के साथ नूतन वर्ष का स्वागत किया। लखबीरसिंह लक्खा के भजनों और शिव कृपा डोरा सिद्धि के साथ संपन्न हुए इस ऐतिहासिक महामहोत्सव में सनातन धर्म की अटूट आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया, जब मीरा नगर के विशाल प्रांगण में हजारों श्रद्धालुओं ने सनातन संस्कारों और भक्ति की अटूट आस्था के साथ नव वर्ष का स्वागत किया। अवसर था कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु पूज्यपाद वसन्त विजयानन्द गिरी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित 'महालक्ष्मी कोटि कुंकुमार्चन यज्ञ पूजा साधना महामहोत्सव' का, जहाँ ३१ दिसंबर की पूरी रात भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रही।
महोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष नानालाल बया और महामंत्री देवेन्द्र मेहता के नेतृत्व में आयोजित इस विराट धर्मसभा में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि समूचा परिसर छोटा पड़ गया। दैनिक साधना और महालक्ष्मी यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात जब जगद्गुरु वसंत विजयानन्द गिरी महाराज ने एकलिंगजी शिव पुराण कथा का वाचन आरंभ किया, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। महाराज श्री ने कथा के दौरान मृदंडी ऋषि पुत्र के जीवन के अंतिम १६वें वर्ष के मार्मिक वृतांत को विस्तार से समझाया और विभिन्न पौराणिक पात्रों के जीवन चरित्र की व्याख्या की।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए जगद्गुरु ने भगवान एकलिंगनाथ की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि समूची सृष्टि और सात समुद्रों की परिक्रमा से प्राप्त होने वाला पुण्य मात्र भगवान एकलिंगनाथ की एक परिक्रमा से मिल जाता है। उन्होंने आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया कि समस्त देवी-देवता पाषाण स्वरूप में साक्षात एकलिंगजी के इर्द-गिर्द विद्यमान हैं, यही कारण है कि राजस्थान की इस पावन धरा पर विश्व ज्योति भगवान एकलिंगजी के साथ सभी देवताओं का वास है।
इस आध्यात्मिक समागम का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह रहा जब जगद्गुरु ने पांडाल में उपस्थित जनसमुदाय को २७ बार पवित्र मंत्रोच्चार के साथ 'शिव कृपा डोरा' सिद्ध करवाया, जो समस्त कष्टों का निवारण करने वाला माना जाता है। इसके साथ ही हजारों भक्तों ने मंत्रोच्चार के बीच गुरुदेव से गुरु दीक्षा ग्रहण की, जिससे पूरा पांडाल माँ पद्मावती और जगद्गुरु के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
भक्ति के इस उत्सव को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य सुप्रसिद्ध भजन गायक लखबीरसिंह लक्खा ने किया। जगद्गुरु से आशीर्वाद लेकर लक्खा ने जब 'प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी' से भजनों की शुरुआत की, तो श्रद्धालु झूमने पर मजबूर हो गए। रात के तीसरे प्रहर तक चली इस सुमधुर भजन संध्या में लक्खा ने 'लाल-लाल चुनरी', 'मैया का चोला', 'कीजो केसरी के लाल' और खाटू श्याम की आराधना के भजनों की ऐसी प्रस्तुति दी कि कड़ाके की ठंड में भी भक्तों का उत्साह चरम पर रहा। उदयपुर में पहली बार सनातनी परंपराओं के इस अनूठे संगम ने आधुनिक चकाचौंध के बीच धर्म की विजय का उद्घोष किया।

Pratahkal Bureau
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