उदयपुर: श्रीमद्भागवत कथा में रासेश्वरी देवी ने दी बुद्धि और सृष्टि की व्याख्या
उदयपुर के आशीष वाटिका में नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत महोत्सव के दौरान रासेश्वरी देवी ने बुद्धि के सही उपयोग और आध्यात्मिक ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला।

उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर के हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित 'आशीष वाटिका' के पावन प्रांगण में इन दिनों अध्यात्म की एक अनूठी वैचारिक क्रांति का संचार हो रहा है। यहाँ आयोजित नौ दिवसीय 'पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य' महोत्सव के पंचम दिवस पर आध्यात्मिक वक्ता पूजनीया रासेश्वरी देवी जी की दिव्य वाणी से प्रस्फुटित दार्शनिक सूत्रों ने पांडाल में उपस्थित हजारों प्रबुद्ध श्रोताओं को आत्म-मंथन के लिए प्रेरित किया। इस अलौकिक सत्र का शुभारंभ शंखध्वनि, वेदमंत्रों के सस्वर पाठ और सामूहिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसने संपूर्ण परिसर को सकारात्मक तरंगों से अभिभूत कर दिया।
दिव्य मंच से 'बुद्धि की शक्ति' की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए रासेश्वरी देवी जी ने प्रतिपादित किया कि मानव जीवन में बुद्धि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही जीवन की अंतिम दिशा निर्धारित करती है। उन्होंने कहा कि बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक, हम अपनी बुद्धि में जैसा ज्ञान संचित करते हैं, हमारी चेतना तदनुसार ही जीवन के मार्गों का चयन करती है। अतः मानव मात्र का यह कर्तव्य है कि वह अपनी बुद्धि में कोरी सांसारिक बातों के स्थान पर श्रेष्ठ और आत्म-उत्थान संबंधी आध्यात्मिक ज्ञान को समाहित करे। पूजनीया देवी के अनुसार, श्रीमद्भागवत मात्र कोई पारंपरिक अनुष्ठान या मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनुभवात्मक व्यावहारिक विज्ञान है, जिसके सेवन से साधक के अंतःकरण में धैर्य, गंभीरता, दया और सहानुभूति जैसे ईश्वरीय गुण स्वतः प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
भक्ति के गुप्त सिद्धांतों और 'सृष्टि के प्राकट्य' पर प्रकाश डालते हुए रासेश्वरी देवी ने डार्विन की इवोल्यूशन थ्योरी का तार्किक और दार्शनिक खंडन किया। उन्होंने तर्क प्रस्तुत किया कि यदि विज्ञान यह मानता है कि एककोशकीय जीव से बंदर और फिर क्रमिक विकास से मनुष्य का निर्माण हुआ, तो यह नियम आज के जंगलों में दृष्टिगोचर क्यों नहीं होता? उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में बिना कारण के कोई कार्य घटित नहीं होता। जिस प्रकार मिट्टी का घड़ा निर्मित करने के लिए कुम्हार की बुद्धि, चाक और मिट्टी जैसे अनेक कारणों की अनिवार्यता होती है, उसी प्रकार इस सुव्यवस्थित ब्रह्मांड, ग्रहों और नक्षत्रों के संचालन के पीछे साक्षात परब्रह्म ही परम कारण हैं। भगवान ने अपनी त्रिगुणात्मक माया शक्ति को संकेत मात्र दिया, जिससे तामस, राजस और सात्विक अहंकार के योग से चौबीस तत्वों के इस विराट शरीर का निर्माण हुआ। देवी ने रेखांकित किया कि जब स्वयं ब्रह्मा जी अपनी बुद्धि के बल पर उस विराट के मूल को खोजने निकले, तो वे असफल रहे, क्योंकि असीम परमात्मा को सीमित बुद्धि या अहंकार से नहीं, अपितु केवल पूर्ण शरणागति और तप के माध्यम से ही जाना जा सकता है। यह महोत्सव न केवल ज्ञान का प्रसार कर रहा है, बल्कि समाज में आध्यात्मिक चेतना के प्रति एक नई दृष्टि का सूत्रपात भी कर रहा है।

