उदयपुर: शतखण्ड पृथ्वी के सर्वोत्तम स्थान मेवाड़ में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, वसन्त विजयानन्द गिरी महाराज ने सुनाई राजा एकलिंगजी की महिमा
उदयपुर में मेवाड़ के पवित्र स्थल मेदपाट पर आयोजित श्री महालक्ष्मी कोटि कुंकुमार्चन यज्ञ महोत्सव में जगद्गुरु वसन्त विजयानन्द गिरी महाराज ने राजा एकलिंगजी और शिव महापुराण की कथा सुनाई। श्रद्धालुओं ने कथा के माध्यम से मेवाड़ की पौराणिक उत्पत्ति और पवित्रता का अनुभव किया।

उदयपुर (वि.)। शतखण्ड पृथ्वी पर सर्वोत्तम स्थान यदि कोई है, तो वह मेदपाट यानि मेवाड़ है। यही पावन स्थल है जहाँ जगत पूज्य एकलिंगजी का प्राकट्य हुआ और जहाँ की पवित्रता का वर्णन आज भी श्रद्धालुओं के हृदय में गूंजता है। सोमवार को श्री महालक्ष्मी कोटि कुंकुमार्चन यज्ञ पूजा महोत्सव के प्रथम दिवस की संध्या पर अनन्त विभूषित कृष्णगिरी तीर्थ पीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्री वसन्त विजयानन्द गिरी महाराज ने राजा एकलिंगजी और शिव महापुराण की कथा सुनाकर उपस्थित श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
गुरुदेव ने कथा प्रारंभ करते हुए बताया कि जब भगवान विष्णु शयनरत थे, उनके कान के मैल से दो दैत्य, मधु और केतक, उत्पन्न हुए। इन दैत्यों ने पृथ्वी पर तांडव मचाया। दुखित देवगण भगवान विष्णु के पास पहुंचे और आग्रह किया कि इन दैत्यों का अंत केवल आप ही कर सकते हैं। भगवान विष्णु ने दुर्लभ अस्त्रों का उपयोग किया, पर दैत्य पुनः जीवित हो उठते। तब देवों ने कहा कि मायापति ही इन दैत्यों को माया से परास्त कर सकते हैं।
गुरुदेव ने कथा में आगे बताया कि भगवान विष्णु ने दैत्यों की प्रशंसा कर उन्हें स्वयं वरदान मांगने का अवसर दिया। इसी अवसर का लाभ उठाकर भगवान विष्णु ने वरदान प्राप्त किया कि वे दोनों दैत्य उनके हाथों मारे जाएँ। इस प्रकार मधु और केतक का नाश हुआ, और उनके गिराए गए मेद से धरती स्वच्छ हुई, जिसे मेदिनी कहा गया। इस स्वच्छ और पवित्र भाग को मेदपाट के नाम से जाना गया, जो आज का मेवाड़ है।
कार्यक्रम में महोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष नानालाल बया और महामंत्री देवेन्द्र मेहता ने बताया कि इस अवसर पर मेड़ता सिटी विधायक लक्ष्मणराम कलरू ने भी कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु पूज्यपाद वसन्त विजयानन्द गिरीजी महाराज का मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री कलरू ने गुरुदेव से विभिन्न सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा भी की।
इस धार्मिक और पौराणिक कथा ने उपस्थित श्रद्धालुओं को मेवाड़ की प्राचीन पवित्रता और राजा एकलिंगजी की महिमा के प्रति गहरा श्रद्धाभाव प्रदान किया। इस आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को जीवंत किया बल्कि मेवाड़ के ऐतिहासिक और पवित्र स्वरूप को भी जन-जन तक पहुँचाया।
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