पुलिस कस्टडी में युवक की संदिग्ध मौत : परिवार को मिलेगा 27.5 लाख मुआवजा
मृतक के परिवार के एक सदस्य को संविदा पर सरकारी नौकरी देने पर सहमति बनी। वहीं, मामले में संलिप्त बताए गए दोवड़ा थाना के थानाधिकारी और चार कांस्टेबलों को लाइन हाजिर कर दिया

उदयपुर। डूंगरपुर जिले के दोवड़ा थाना क्षेत्र में चोरी के संदेह में पुलिस हिरासत में लिए गए 19 वर्षीय युवक दिलीप अहारी की मौत ने पूरे क्षेत्र में संवेदनाओं को झकझोर दिया। घटना के बाद आदिवासी समाज और परिजनों की नाराजगी ने प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बढ़ा दिया। बुधवार को कई दौर की वार्ता और प्रशासनिक समन्वय के बाद मृतक के परिवार को 27.5 लाख रुपये का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को संविदा पर सरकारी नौकरी देने पर सहमति बनी। वहीं, मामले में संलिप्त बताए गए दोवड़ा थाना के थानाधिकारी और चार कांस्टेबलों को लाइन हाजिर कर दिया गया है।
मृतक दिलीप अहारी, पुत्र जीवराज अहारी, निवासी कलारिया सागवाड़ा, को 26 सितंबर की रात स्कूल से पोषाहार चोरी करने के संदेह में दोवड़ा थाना पुलिस ने हिरासत में लिया था। अगले दिन दोपहर 12 बजे अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उसे तत्काल डामड़ी अस्पताल ले जाया गया। प्रारंभिक उपचार के दौरान हालत गंभीर पाई गई और उसे डूंगरपुर के सार्वजनिक चिकित्सालय रेफर किया गया। 27 सितंबर को अस्पताल में इलाज जारी रहा, लेकिन सुधार न होने पर एमबी चिकित्सालय में स्थानांतरित किया गया। 28 से 30 सितंबर तक वहां उपचार चलता रहा, लेकिन 30 सितंबर की शाम उपचार के दौरान दिलीप की मौत हो गई।
दिलीप की मौत के बाद आदिवासी समाज और परिवारजन पिछले चार दिनों से दोवड़ा थाना के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। वे मृतक के परिवार के लिए मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए थे। सांसद राजकुमार रोत के नेतृत्व में आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने लगातार प्रशासन और पुलिस अधिकारियों से वार्ता की।
मृतक के परिवार और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बुधवार को निर्णायक दौर की वार्ता हुई। इसमें टीएडी मंत्री बाबूलाल खराड़ी, उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत, कलेक्टर अंकित कुमार सिंह और एसपी मनीष कुमार समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। बातचीत के कई दौरों के बाद मृतक के परिवार को 27.5 लाख रुपये मुआवजा देने और परिवार के एक सदस्य को संविदा पर सरकारी नौकरी देने पर सहमति बनी। इसके साथ ही दोवड़ा थाने के थानाधिकारी तेजकरण सिंह और चार कांस्टेबल—हैड कांस्टेबल वल्लभराम पाटीदार, कांस्टेबल सुरेश कुमार भगोरा, पुष्पेंद्र और माधव—को लाइन हाजिर कर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि जांच के बाद दोषी पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
मृतक का पोस्टमार्टम न्यायिक मजिस्ट्रेट की निगरानी में मेडिकल बोर्ड द्वारा किया गया। बोर्ड का नेतृत्व डॉ. हेमंत शांडिल्य ने किया, जिसमें मेडिसीन विभाग के डॉ. आयुष गुप्ता, सर्जरी विभाग के डॉ. गिरिश, सामान्य चिकित्सालय डूंगरपुर के डॉ. राजेश रोत और डॉ. प्रवीण सुखबीर शामिल थे। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवाई गई। इसके बाद शव परिवार को सौंपा गया और पुलिस निगरानी में उसे उसके पैतृक गांव के लिए रवाना किया गया।
एसपी मनीष कुमार ने बताया कि मामले में प्रारंभिक जांच के आधार पर दोवड़ा थाना के थानाधिकारी और चार कांस्टेबलों को लाइन हाजिर कर दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस पूरे मामले में आदिवासी समाज की सक्रियता और परिवार के संघर्ष ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर किया। सांसद राजकुमार रोत और अन्य जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में प्रशासनिक वार्ता ने मामले को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से सुलझाने का प्रयास किया। आदिवासी जनप्रतिनिधियों और परिवार ने पोस्टमार्टम के लिए तैयार होने के बाद अधिकारियों को आश्वासन दिया कि वे आगे किसी अप्रिय स्थिति से बचेंगे।
इस घटना ने पुलिस हिरासत में मृत्यु और उसकी जांच के महत्व को भी उजागर किया। यह मामला न केवल स्थानीय प्रशासन के प्रति आदिवासी समाज की संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत करता है कि न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है। मृतक परिवार को मुआवजा और सरकारी नौकरी मिलने की घटना से प्रशासन की जिम्मेदारी और कार्रवाई की क्षमता का भी प्रदर्शन हुआ है।
दिलीप अहारी की मौत और इसके बाद की प्रशासनिक कार्रवाई ने डूंगरपुर जिले में पुलिस हिरासत के मामलों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। यह घटना आदिवासी समाज और प्रशासनिक निकायों के बीच समन्वय और संवाद की आवश्यकता को भी स्पष्ट करती है। प्रशासन ने मृतक के परिवार के हितों की रक्षा करते हुए कार्रवाई सुनिश्चित की, जबकि समाजजन और जनप्रतिनिधियों ने अपनी सक्रियता और लगातार संवाद के माध्यम से निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित किया।
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि पुलिस हिरासत में मौत जैसे संवेदनशील मामलों में समय पर न्याय और पारदर्शी प्रक्रिया कितना महत्वपूर्ण है। मृतक के परिवार को मुआवजा और नौकरी मिलना उनके अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ प्रशासन की जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। इस मामले ने क्षेत्र में कानून और प्रशासनिक जवाबदेही के महत्व को फिर से उजागर किया है, और भविष्य में ऐसे मामलों में सतर्कता बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
