उदयपुर में सेंट्रल जेल में कैदियों के लिए स्टोरीटेलिंग कार्यक्रम: रचनात्मकता और आत्मविश्वास का सशक्त मंच
उदयपुर सेंट्रल जेल में मां माय एंकर फाउण्डेशन द्वारा आयोजित स्टोरीटेलिंग कार्यक्रम में कैदियों ने अपनी कहानियाँ साझा कीं। सुष्मिता सिंघा, सलिल भंडारी, चारुल चोयल, शिबली खान और आशुतोष पांडे की मौजूदगी में यह पहल रचनात्मकता, आत्मविश्वास और सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा देने का अनूठा प्रयास साबित हुई।

उदयपुर (वि.)। उदयपुर केन्द्रीय जेल में एक अनूठा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसने कैदियों को अपनी भावनाओं और अनुभवों को कहानियों के माध्यम से व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया। मां माय एंकर फाउण्डेशन ने 7वें उदयपुर टेल्स इंटरनेशनल स्टोरीटेलिंग फेस्टिवल से पूर्व यह कार्यक्रम जेल में विशेष रूप से आयोजित किया। इस पहल का उद्देश्य मौखिक कहानी सुनाने की परंपरा के माध्यम से कैदियों में रचनात्मक अभिव्यक्ति, भावनात्मक चिंतन और आत्मविश्वास का विकास करना था।
फाउण्डेशन की संस्थापक सुष्मिता सिंघा ने बताया कि कार्यक्रम में प्रस्तुत कहानियाँ न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से सार्थक थीं, बल्कि कैदियों को लचीलेपन, परिवर्तन, आशा और जीवन के अनुभवों से प्रेरित व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस दौरान कैदियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने उदयपुर टेल्स के समावेशी दृष्टिकोण को भी दर्शाया, जिसके तहत कहानी सुनाना केवल पारंपरिक मंचों तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि जेल जैसी सीमित परिस्थितियों में भी हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ को बुलंद किया जाता है।
उदयपुर टेल्स इंटरनेशनल स्टोरीटेलिंग फेस्टिवल के संस्थापक सलिल भंडारी ने इस अवसर पर बताया कि सेंट्रल जेल में आयोजित यह कहानी सुनाने की प्रतियोगिता समावेशिता, सामाजिक प्रभाव और कहानियों की परिवर्तनकारी शक्ति के प्रति उदयपुर टेल्स की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनका कहना था कि किसी भी परिस्थिति में हर व्यक्ति के पास सुनाने योग्य एक कहानी होती है, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकती है।
कार्यक्रम में उदयपुर टेल्स के सलाहकार और सहयोगी चारुल चोयल, शिबली खान और आशुतोष पांडे ने कहानी सुनाने के महत्व पर जोर देते हुए इसे पुनर्वास, भावनात्मक कल्याण और व्यक्तिगत विकास का शक्तिशाली साधन बताया। उन्होंने कहा कि यह कैदियों में आत्मनिरीक्षण, मानवीय जुड़ाव और आपसी समझ को बढ़ाने में मदद करता है।
जेल अधिकारियों ने भी इस पहल की सराहना की और कहा कि इस तरह की रचनात्मक गतिविधियाँ कैदियों का मनोबल बढ़ाने और आत्म-चिंतन के लिए सकारात्मक रास्ते प्रदान करती हैं। यह कार्यक्रम साबित करता है कि शिक्षा और कला की शक्ति सीमाओं को पार कर सकती है और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों को भी अपनी आवाज़ उठाने का अवसर प्रदान करती है।
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Pratahkal Bureau
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