उदयपुर। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर शुरू हुए जनजाति गौरव वर्ष के अंतर्गत आज से माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई) में राज्य स्तरीय जनजाति काष्ठ कला कार्यशाला का शुभारंभ होने जा रहा है। यह छह दिवसीय आवासीय कार्यशाला 7 से 12 नवम्बर तक आयोजित की जाएगी, जिसमें राजस्थान के विभिन्न जिलों से 25 जनजाति कलाकार अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन करेंगे।

टीआरआई के निदेशक ओ.पी. जैन ने बताया कि इस कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय परंपराओं और उनकी प्राचीन काष्ठ कला को संरक्षित करना तथा युवा जनजाति कलाकारों को पारंपरिक लकड़ी शिल्प की विविध तकनीकों से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन न केवल जनजाति कला की विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, बल्कि यह जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी सशक्त बनाने का माध्यम बनेगा।

कार्यशाला का उद्घाटन अतिरिक्त मुख्य सचिव, जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, कुंजीलाल मीणा की अध्यक्षता में होगा। वहीं, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय से प्रो. हेमंत द्विवेदी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे और मूर्तिशिल्प सृजन के विविध पहलुओं पर प्रतिभागियों का मार्गदर्शन करेंगे।

राज्य भर से चुने गए प्रतिभागियों में कई प्रसिद्ध जनजाति कलाकार भी शामिल हैं, जिनमें राष्ट्रपति द्वारा "आदि गौरव सम्मान" से सम्मानित कलाकार डिम्पल चण्डात, राज्यस्तरीय सम्मान प्राप्त दिलीप कुमार डामोर, डॉ. यशपाल बरण्डा, चन्द्रिका परमार, प्रभुलाल गमेती और प्रवीण बरण्डा प्रमुख हैं। इनके अलावा वरिष्ठ कलाकार वाडीलाल, नवीन चंद्र, खेमराज डिण्डौर और मांगूसिंह भी अपनी विशिष्ट काष्ठ कला शैली से कलाकृतियों का निर्माण करेंगे।

टीआरआई निदेशक ने बताया कि जनजाति गौरव वर्ष के अंतर्गत संस्थान द्वारा पिछले वर्षभर में अनेक रचनात्मक गतिविधियाँ और कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इन्हीं प्रयासों की श्रृंखला में हाल ही में नेशनल ट्राइबल फूड फेस्टिवल का भी सफल आयोजन किया गया था। अब इस काष्ठ कला कार्यशाला के माध्यम से जनजातीय शिल्प की अमर परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रयास किया जा रहा है।

Pratahkal Bureau

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