खेरवाड़ा में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शिव विवाह व ध्रुव चरित्र की गूंज
पं. अंकित जी महाराज ने शिव विवाह, ध्रुव चरित्र और भरत चरित्र की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध किया, एकादशी पर महाआरती के बाद बटा प्रसाद।

कस्बा स्थित पुराना बस स्टैंड के टांक सभागार में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन व्यासपीठ के सामने भक्ति रस में झूमकर नृत्य करते श्रद्धालु और उपस्थित जनसमूह।
कस्बे के पुराना बस स्टैंड स्थित टांक सभागार में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिवस पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। वृंदावन से पधारे प्रसिद्ध कथावाचक पं. श्री अंकित जी महाराज ने शिव विवाह, राजा पृथु, ध्रुव, बाणासुर, इन्द्र-वृत्रासुर युद्ध एवं भरत चरित्र का भावपूर्ण एवं रोचक वर्णन प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर सभागार में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। पूरा सभागार श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा।
भागवत कथा के प्रवक्ता जगदीश व्यास ने जानकारी देते हुए बताया कि व्यासपीठ से प्रवचन करते हुए पं. अंकित जी महाराज ने ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के संगम को शिव विवाह का मूल संदेश बताया। उन्होंने वृत्रासुर प्रसंग के माध्यम से त्याग, निस्वार्थ सेवा, दधीचि ऋषि के बलिदान और धर्म की विजय के महत्व को विस्तार से समझाया।
शिव विवाह प्रसंग में कथावाचक ने बताया कि माता सती के देहत्याग के पश्चात उन्होंने हिमालय और मैना देवी के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ, जिसमें शिवजी की बारात में भूत, प्रेत, यक्ष और गंधर्व शामिल रहे, फिर भी माता पार्वती ने शिव को स्वीकार किया।
राजा पृथु के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि वेन राजा के अत्याचारों के कारण धरती ने अन्न देना बंद कर दिया था, जिसके बाद राजा पृथु ने धरती का संरक्षण कर उसे गाय के रूप में दुहकर प्रजा का पालन किया। उनके नाम पर ही पृथ्वी नाम पड़ा।
ध्रुव चरित्र में बताया गया कि मात्र पांच वर्ष की आयु में अपमान से आहत होकर ध्रुव ने वन में कठोर तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें अटल स्थान प्राप्त हुआ, जिन्हें ध्रुव तारे के रूप में जाना जाता है। वहीं बाणासुर प्रसंग में अहंकार के कारण हुए हरि-हर युद्ध और भगवान विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से उसके अभिमान के अंत का वर्णन किया गया।
भरत चरित्र में महाराज ने बताया कि भगवान ऋषभदेव के पुत्र राजा भरत मोह के बावजूद ज्ञान और वैराग्य के आदर्श बने रहे, जिनके नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा। कथा के दौरान भजन-कीर्तन और भक्तिमय नृत्य ने वातावरण को पूरी तरह आध्यात्मिक रंग में रंग दिया।
श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भक्ति रस में डूबकर आनंद लिया। कथा में पांव थोकने की रस्म विनय-सुमन, मुकेश-संगीता, करुणा-राजकुमार एवं मोना देवी द्वारा संपन्न की गई। अधिक मास की पवित्र एकादशी पर महाआरती के पश्चात श्रद्धालुओं को राजगिरा हलवा, केला एवं आम का प्रसाद वितरित किया गया। कथा का समापन भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच हुआ।

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