रासेश्वरी देवी ने बताया आत्मा का सनातन धर्म, उदयपुर में भागवत कथा आयोजित
उदयपुर के आशीष वाटिका में आयोजित श्रीमद्भागवत महोत्सव के तीसरे दिन रासेश्वरी देवी ने शारीरिक और आत्मिक धर्म के दार्शनिक पक्षों की व्याख्या की।

ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वावधान में हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित ‘आशीष वाटिका’ में आयोजित नौ दिवसीय ‘पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य’ महोत्सव के तृतीय दिवस व्यासपीठ से रासेश्वरी देवी ने धर्म, आत्मा और भक्ति के गूढ़ दार्शनिक पक्षों का विस्तार से निरूपण करते हुए कहा कि परिवर्तनशील शारीरिक धर्मों से ऊपर उठकर आत्मा के शाश्वत धर्म को पहचानना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। कार्यक्रम का शुभारंभ व्यासपीठ के पारंपरिक पूजन, मंगल शंखध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
व्यासपीठ से धर्म की वैज्ञानिक और तात्विक व्याख्या करते हुए रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि संसार में धर्म को लेकर अनेक भ्रांतियाँ व्याप्त हैं, जबकि वास्तविकता में केवल दो ही धर्म हैं—अपर अर्थात शारीरिक धर्म और पर अर्थात आत्मिक धर्म। उन्होंने कहा कि वर्णाश्रम व्यवस्था के नियम, कुल और समाज की मर्यादाएँ शरीर पर आधारित हैं, जो समय के साथ परिवर्तनशील और नश्वर हैं। इसके विपरीत आत्मा का एकमात्र सनातन धर्म परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण से अनन्य प्रेम और उनकी नि:स्वार्थ भक्ति है।
उन्होंने कहा कि जब शारीरिक धर्म आत्मा के धर्म में बाधक बनने लगे, तब उसे त्याग देना ही श्रेष्ठ है। इस संदर्भ में उन्होंने लक्ष्मण जी और भरत जी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने राम भक्ति के लिए सांसारिक मर्यादाओं से ऊपर उठकर आत्मिक धर्म का पालन किया। रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि भगवान गुणों, रूप या सांसारिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि केवल निष्कपट भाव से रीझते हैं। उन्होंने एक मार्मिक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मेले में खोए बच्चे को खोजने के लिए एक व्याकुल पिता ऊँचे टीले पर खड़ा होकर हाथ हिलाता है, उसी प्रकार संसार रूपी विराट मेले में भटके जीवों को पुकारने के लिए श्रीनाथ जी गोवर्धन पर्वत पर आज भी अपना बायाँ हाथ उठाए खड़े हैं।
भक्ति के व्यावहारिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए पूजनीया देवी जी ने कहा कि वास्तविक भक्ति ‘अहैतुकी’ और ‘अप्रतिहता’ होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति किसी कामना की पूर्ति या दुख दूर करने की शर्त पर भगवान का जप अथवा पूजा करता है, तो वह भक्ति नहीं बल्कि ‘मजदूरी’ अथवा ‘घूस’ है। उन्होंने कहा कि प्रेम में नापतोल या गिनती का कोई स्थान नहीं होता। जब मनुष्य अपनी चेतना को वासुदेव के चरणों में समर्पित कर देता है, तब भक्ति रूपी कन्या से ‘अनुभवात्मक ज्ञान’ और ‘स्वाभाविक वैराग्य’ रूपी दो संतानों का स्वतः प्राकट्य होता है।
कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर श्रीमद्भागवत महापुराण के ज्ञान रहस्य का श्रवण किया। सेक्टर-13 स्थित आयोजन स्थल ‘आशीष वाटिका’ में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण का विशेष प्रभाव देखने को मिला।

Pratahkal Bureau
प्रातःकाल ब्यूरो, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा ब्यूरो राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
