विभीषण का राज्याभिषेक और धर्म की विजय का संदेश बना रामकथा का प्रमुख आकर्षण
कथावाचक वीरेंद्र शास्त्री ने बाली वध, सुरसा और विभीषण राज्याभिषेक के प्रसंग सुनाए, महाआरती और महाप्रसाद वितरण के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।

मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध राम मंदिर में आयोजित दिव्य रामकथा के अंतिम दिन कथावाचक श्री वीरेंद्र शास्त्री के आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हुए भक्तिभाव में लीन श्रद्धालुगण।
नगर के प्रसिद्ध राम मंदिर में आयोजित दिव्य रामकथा के चौदहवें दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक संदेशों का अद्भुत संगम देखने को मिला। मध्यप्रदेश के प्रख्यात कथावाचक श्री वीरेंद्र शास्त्री ने बाली वध, स्वयंप्रभा, संपात्ति, सुरसा तथा विभीषण के राज्याभिषेक जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का भावपूर्ण एवं रोचक वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, नीति और भक्ति के गूढ़ संदेशों से अवगत कराया।
दिव्य रामकथा के प्रवक्ता जगदीश व्यास ने बताया कि कथा वाचन के दौरान श्री शास्त्री ने बाली वध प्रसंग को धर्म, न्याय और मित्रता का प्रतीक बताते हुए कहा कि भगवान राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाने के अपने वचन का पालन करते हुए बाली का वध किया। उन्होंने कहा कि बाली को ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त था कि जो भी उसके सामने युद्ध करता, उसकी आधी शक्ति बाली में समा जाती थी। इसी कारण भगवान राम ने वृक्ष की ओट से बाण चलाकर उसका वध किया।
कथावाचक ने स्वयंप्रभा प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि गंधर्वराज की पुत्री स्वयंप्रभा ने मायावी गुफा में पहुंचे वानरों की सहायता की और उन्हें भोजन एवं जल उपलब्ध कराने के साथ अपने तपोबल से गुफा से बाहर दक्षिण समुद्र तट तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि गुफा माया का प्रतीक है और उससे बाहर निकलना प्रभु से मिलन का मार्ग दर्शाता है। वहीं संपात्ति प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि जटायु के बड़े भाई संपात्ति ने अपने जले हुए पंखों के बावजूद माता सीता के स्थान और लंका की जानकारी देकर रामकाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सुरसा प्रसंग का वर्णन करते हुए श्री शास्त्री ने बताया कि सुरसा नागों की माता थीं, जिन्हें देवताओं ने हनुमानजी की बुद्धि और बल की परीक्षा लेने के लिए भेजा था। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग विनय, बुद्धिमत्ता और संयम की विजय का संदेश देता है।
कथा के दौरान विभीषण प्रसंग विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। श्री शास्त्री ने बताया कि रावण द्वारा निष्कासित किए जाने के बाद विभीषण भगवान राम की शरण में पहुंचे। भगवान राम ने युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व ही उन्हें लंका का भावी राजा घोषित कर उनका राज्याभिषेक किया। राम-रावण युद्ध में भी विभीषण ने रावण की नाभि में अमृत होने का रहस्य बताकर धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
कथा के दौरान भजन-कीर्तन का आयोजन भी हुआ, जिसमें श्रद्धालु भक्तिभाव से सराबोर होकर झूम उठे। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान राम एवं विभीषण की आरती उतारकर पुष्पवर्षा की। महाआरती एवं महाप्रसाद वितरण के साथ दिव्य रामकथा का समापन हुआ। कथा ने श्रद्धालुओं को धर्म, नीति, समर्पण और सत्य की विजय का संदेश प्रदान किया।

Dinesh Kumar Jain, Kherwara(Udaipur)
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