शैक्षिक महासंघ ने रिक्त पदों के प्रदर्शन में भेदभाव का आरोप लगाते हुए शिक्षा मंत्री को ज्ञापन सौंपा और वर्तमान चयन प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है।

फतहनगर। राजस्थान में व्याख्याता काउंसलिंग की प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है, जहां नियमों की अनदेखी और रिक्त पदों के प्रदर्शन में भारी विसंगतियों ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (विद्यालय शिक्षा) ने इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का आरोप लगाते हुए राज्य के शिक्षा मंत्री को एक कड़ा ज्ञापन प्रेषित किया है। महासंघ ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान काउंसलिंग प्रक्रिया में नियमों को ताक पर रखकर पदों का प्रदर्शन किया जा रहा है, जिससे शिक्षकों के भविष्य और छात्रों की पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना निश्चित है। संगठन ने विभागीय प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से पुनर्विचार करने और आवश्यक संशोधनों के पूर्ण होने तक काउंसलिंग को स्थगित करने की पुरजोर मांग की है।

महासंघ के प्रदेश महामंत्री महेंद्र कुमार लखारा ने ज्ञापन के माध्यम से विभाग की दोहरी नीति को उजागर करते हुए बताया कि विभाग द्वारा 120 प्रतिशत रिक्तियां खोलने के स्थापित नियम की समान रूप से पालना नहीं की जा रही है। इतिहास, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, हिंदी और राजनीति विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों में नियमानुसार रिक्त पद प्रदर्शित नहीं किए गए हैं। विडंबना यह है कि जहां कुछ विषयों में 100 प्रतिशत रिक्तियां दिखाई जा रही हैं, वहीं अन्य में 120 प्रतिशत का मानदंड अपनाया गया है, जो विभाग की मनमानी को दर्शाता है। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों में पद रिक्त होने के बावजूद उन्हें काउंसलिंग पोर्टल पर जानबूझकर छिपाया जा रहा है। विशेष रूप से भौतिक विज्ञान विषय की स्थिति चिंताजनक है; शाला दर्पण पोर्टल के अनुसार गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिलों में 143 पद रिक्त हैं, किंतु काउंसलिंग पोर्टल पर गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू और झुंझुनूं जिलों में एक भी रिक्त पद नहीं दिखाया गया है।

संगठन ने विभागीय पारदर्शिता पर प्रहार करते हुए कहा कि क्रमोन्नत विद्यालयों में व्याख्याताओं के रिक्त पद न खोलना सीधे तौर पर छात्र हितों के विरुद्ध है, जिससे ग्रामीण अंचलों की शिक्षण व्यवस्था चरमरा जाएगी। विभाग पर अपनी सुविधा अनुसार रिक्तियों की गणना करने और उप-प्राचार्य पदों के आवंटन में भेदभावपूर्ण नीति अपनाने के भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, पीएम श्री विद्यालयों की चयन प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में है। पूर्व में 60 प्रतिशत अंकों की कड़ी बाध्यता के कारण इन विद्यालयों में शिक्षकों के आवेदन न्यून रहे, किंतु अब उन्हीं पदों को सामान्य व्याख्याता काउंसलिंग में शामिल किया जाना पूरी चयन प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल खड़ा करता है।

महासंघ ने सरकार के समक्ष अपनी मांगों को दृढ़ता से रखते हुए कहा है कि वर्ष 2019 से 2023 के मध्य क्रमोन्नत हुए सभी विद्यालयों की रिक्तियों को तत्काल पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए। साथ ही, सभी विषयों में 120 प्रतिशत के नियम को बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाए ताकि वास्तविक रिक्त विद्यालयों का विकल्प शिक्षकों को मिल सके। संगठन ने एक व्यवस्थित क्रम का सुझाव देते हुए कहा है कि विभाग को सर्वप्रथम प्रधानाचार्य काउंसलिंग, तत्पश्चात उप-प्रधानाचार्य काउंसलिंग और अंत में व्याख्याता काउंसलिंग आयोजित करनी चाहिए। महासंघ ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि जब तक एक स्पष्ट और न्यायसंगत नीति का निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक वर्तमान काउंसलिंग प्रक्रिया को रोका जाना ही न्यायोचित होगा।

Pratahkal HQ

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