राजस्थान में IFMS 3.0 के जरिए निजी फिनटेक कंपनियों को वेतन से डायरेक्ट कटौती की सुविधा पर सवाल तेज, कर्मचारी संगठनों ने RTI और ACB जांच की मांग उठाई।

राजस्थान के प्रशासनिक और वित्तीय गलियारों में इस समय एक गंभीर नीतिगत विवाद सामने आया है। राज्य के 1 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों के सुरक्षित पेरोल सिस्टम IFMS 3.0 के माध्यम से 'रिफ़ाइन' (Refyne) जैसी बाहरी निजी टेक कंपनियों को करीब 3,000 करोड़ रुपये के समानांतर कमर्शियल लोन बाजार तक पहुंच दिए जाने के बाद दशकों पुराने राजस्थान वित्तीय एवं लेखा नियमों (GF&AR) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिक्षक संगठनों और वित्तीय विश्लेषकों ने सचिवालय के आला अधिकारियों की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर किस "अदृश्य वित्तीय हित" या "कमीशन तंत्र" के चलते राज्य सरकार इन निजी कंपनियों की रिकवरी एजेंट की भूमिका निभा रही है।

विवाद का सबसे अहम पहलू राजस्थान सरकार के लंबे समय से लागू वित्तीय नियमों से जुड़ा बताया जा रहा है। नियमों के अनुसार कोई भी आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) किसी भी राजकीय कर्मचारी के व्यक्तिगत उपभोग के ऋण (Personal Loan) के संबंध में किसी भी वित्तीय संस्था को यह लिखित आश्वासन नहीं दे सकता कि संबंधित कर्मचारी की ऋण किस्तें वेतन बिल से काटकर सीधे संस्था को भेजी जाएंगी अथवा उनकी रिकवरी की जिम्मेदारी सरकार या डीडीओ लेगा।

इसी नियम के चलते जब कोई सरकारी कर्मचारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) या अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों से पर्सनल लोन लेता है, तब बैंक अपने जोखिम पर ऋण उपलब्ध कराता है। बैंक कर्मचारी के खाते पर e-NACH के माध्यम से ऑटो-डेबिट की व्यवस्था करता है, लेकिन ट्रेजरी या डीडीओ स्तर पर वेतन से सीधे ऋण की कटौती अथवा रिकवरी की गारंटी प्राप्त नहीं कर सकता।

इसी बीच आरोप लगाया गया है कि इसी प्रतिबंध के बावजूद वित्त विभाग ने IFMS 3.0 के डिजिटल बैकएंड में बदलाव कर बाहरी फिनटेक कंपनियों को 'प्रायोरिटी डायरेक्ट डिडक्शन' का ऐसा एक्सेस उपलब्ध कराया, जिसके माध्यम से कर्मचारी का वेतन बैंक खाते में पहुंचने से पहले ही खजाने के स्तर पर अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित राशि की कटौती सुनिश्चित हो जाती है। इसे दशकों पुराने वित्तीय नियमों के विपरीत बताया जा रहा है।

कर्मचारी संगठनों ने इस पूरे ऋण तंत्र की व्यावसायिक प्रकृति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि योजना को 'वेतन अग्रिम' (Salary Advance) के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तविकता में 1 लाख से अधिक कर्मचारियों को 8 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की व्यावसायिक ब्याज दरों पर 24 से 60 महीने की अवधि वाले ऋण उपलब्ध कराए गए।

संगठनों और वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि जब सरकारी मशीनरी और सरकारी कर्मचारियों के डेटा का उपयोग करते हुए निजी कंपनियों को लगभग शून्य जोखिम वाला पुनर्भुगतान मॉडल उपलब्ध कराया गया है, तब इतनी अधिक ब्याज दरें वसूले जाने का औचित्य क्या है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या इस लगभग 3,000 करोड़ रुपये के वित्तीय कारोबार से होने वाली आय का कोई "कमीशन" या "सर्विस चार्ज अंश" किसी स्तर पर साझा किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने सरकार से इस पूरी व्यवस्था पर स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।

मामले पर एक विधिक एवं लोक वित्त विशेषज्ञ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राजस्थान वित्तीय एवं लेखा नियमों (GF&AR) के तहत किसी भी निजी वित्तीय विलेख अथवा पर्सनल लोन की रिकवरी के लिए डीडीओ द्वारा प्रत्यक्ष गारंटी देना या सॉफ्टवेयर स्तर पर प्रायोरिटी डिडक्शन की व्यवस्था उपलब्ध कराना प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग के समान है। विशेषज्ञ के अनुसार जब विनियमित और सरकारी बैंकों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है, तब बिना स्टांप ड्यूटी चुकाए संचालित बाहरी टेक कंपनियों को ऐसा एकाधिकार प्रदान किया जाना व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की आशंका उत्पन्न करता है।

विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि कर्मचारियों की आय को इस प्रकार निजी कंपनियों के लिए सुरक्षित करना और राष्ट्रीयकृत बैंकों के ऋणों को डिफॉल्ट की स्थिति की ओर धकेलना लोक वित्त के सिद्धांतों के विपरीत है। उनके अनुसार पूरे एपीआई इंटीग्रेशन तथा कथित कमीशन संबंधी आशंकाओं की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) अथवा किसी स्वतंत्र न्यायिक आयोग से जांच कराई जानी चाहिए।

मामले के इस नए पहलू के सामने आने के बाद राज्य के शिक्षक और कर्मचारी संगठनों ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत वित्त विभाग तथा राजस्थान फाइनेंशियल सर्विसेज डिलीवरी लिमिटेड (RFSDL) से इस समझौते से संबंधित मूल नोटशीट और कथित 'सर्विस चार्ज/कमिशन शेयरिंग' से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग तेज कर दी है। संगठनों ने यह भी कहा है कि यदि दशकों पुराने सरकारी नियमों का उल्लंघन कर निजी कंपनियों को यह व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जाएगी।

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