राजस्थान के सरकारी कर्मचारियों के वित्तीय डेटा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले आधार—आईएफएमएस 3.0 (IFMS 3.0)—और 'अर्न सैलरी एडवांस योजना' के इर्द-गिर्द बुना गया वित्तीय जाल अब राज्य के अब तक के सबसे बड़े पेरोल घोटाले और संस्थागत भ्रष्टाचार के गंभीर संकेत दे रहा है। लोक-कल्याण की आड़ में चल रहे इस तंत्र ने सरकारी खजाने को निजी फिनटेक कंपनियों के लिए 'रिकवरी एजेंट' में तब्दील कर दिया है। वित्त विभाग के अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया को महज एक 'व्यावहारिक त्रुटि' बताकर पल्ला झाड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत सरकारी भरोसे की आड़ में एक लाख से अधिक कर्मचारियों के वित्तीय शोषण की कहानी बयां कर रही है।

इस डिजिटल चक्रव्यूह की शुरुआत एक साधारण ओटीपी से होती है। सरकारी कर्मचारी, यह मानकर कि प्रक्रिया पूरी तरह से आधिकारिक आईएफएमएस पोर्टल से जुड़ी है, ओटीपी साझा कर बैठते हैं। इसी के साथ वे अनजाने में अंग्रेजी में लिखे उन जटिल नियमों और शर्तों के जाल में फंस जाते हैं, जो उन्हें शून्य ब्याज वाले एडवांस की जगह 8% से 20% ब्याज वाले 'पर्सनल लोन' के भारी बोझ तले दबा देते हैं। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि बजट 2023 में घोषित 'सैलरी एडवांस' की योजना को बिना किसी आधिकारिक प्रशासनिक आदेश के गुप्त तरीके से दीर्घकालिक पर्सनल लोन में बदल दिया गया। जब यह व्यवस्था अब विशुद्ध व्यावसायिक ऋण बन चुकी है, तो इसकी वसूली सरकारी पेरोल से अनिवार्य रूप से क्यों की जा रही है, यह प्रश्न अनुत्तरित है।

वित्तीय लेखांकन के नियमों को ताक पर रखते हुए एक अन्य गंभीर विसंगति यह सामने आई है कि निजी कंपनियां लोन की राशि कर्मचारी के किसी भी गैर-वेतन खाते में स्थानांतरित कर रही हैं, जबकि रिकवरी सरकारी वेतन बिल से की जा रही है। पोर्टल पर इन गैर-वेतन खातों की मैपिंग की अनुमति किस वैधानिक आदेश के तहत दी गई, इसका कोई स्पष्ट विवरण सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, वेतन पर्ची और जीए-55 (GA-55) के आंकड़ों में विरोधाभास ने इस खेल को और अधिक संदिग्ध बना दिया है। कर्मचारियों की सैलरी स्लिप में यह कटौती नहीं दिखाई देती, लेकिन जीए-55 में इसे वेतन अग्रिम के रूप में दर्ज किया जा रहा है।

इस व्यवस्था का सबसे घातक प्रभाव राष्ट्रीयकृत बैंकों में चल रहे कर्मचारियों के अन्य ऋणों पर पड़ रहा है। आईएफएमएस से वेतन बैंक में पहुंचने से पहले ही निजी कंपनियों की किस्त कट जाने के कारण होम लोन और कार लोन की ईएमआई बाउंस हो रही है, जिससे कर्मचारियों का सिबिल स्कोर पूरी तरह तबाह हो रहा है। इसके साथ ही, इन समझौतों पर राजस्थान स्टांप अधिनियम के तहत ई-स्टांपिंग न होने से सरकार को करोड़ों के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि लगभग 100 करोड़ रुपये का ब्याज राजस्व राज्य की सीमा से बाहर जा रहा है। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 1 लाख से अधिक कर्मचारियों ने 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का यह ऋण लिया है। अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े संस्थान भी इस 'रिस्क-फ्री' रिकवरी मॉडल की होड़ में शामिल होने के लिए प्रस्ताव पेश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोक वित्त सिद्धांतों के इस खुले उल्लंघन और निजी कंपनियों के लिए सरकारी तंत्र के दुरुपयोग की निष्पक्ष न्यायिक और फॉरेंसिक जांच अनिवार्य है, ताकि प्रशासनिक जवाबदेही तय की जा सके।

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