उदयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माता श्वेतांबरी विक्रम भट्ट के बैंक खातों को फ्रीज करने पर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि जांच एजेंसी के निर्देश पर बैंकों द्वारा पूरे खाते को ब्लॉक करना अनुचित है। पुलिस केवल विवादित राशि की सीमा तक ही खातों के डेबिट संचालन पर रोक लगा सकती है। जज फरजंद अली की अदालत में 19 मार्च को यह सुनवाई हुई, जिसका आदेश 28 मार्च को अपलोड हुआ।

धोखाधड़ी का आरोप और पुलिसिया कार्रवाई

मुंबई निवासी फिल्म निर्माता श्वेतांबरी विक्रम भट्ट और विक्रम प्रवीण भट्ट के खिलाफ उदयपुर के डॉ अजय मुर्डिया ने फिल्में बनाने के नाम पर 30 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था। इसमें बताया गया कि भट्ट का शिकायतकर्ता के साथ एलएलपी के माध्यम से फिल्मों के निर्माण का व्यावसायिक समझौता हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप है बाद में चार फिल्मों के निर्माण के नाम पर 47 करोड़ रुपए का बजट बताकर 7 करोड़ रुपए अतिरिक्त मांगे गए। उसने अलग-अलग समय में लगभग 44 करोड़ रुपए दे दिए। आरोप है कि विक्रम भट्ट, श्वेतांबरी भट्ट और दिनेश कटारिया ने फर्जी बिल दिखाकर लगभग 30 करोड़ रुपए के गबन को अंजाम दिया है। जांच अधिकारी डिप्टी छगन पुरोहित के निर्देश पर बैंकों ने याचिकाकर्ता भट्ट दंपती के सभी बचत खातों को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं के वकील के तर्क

मामले में याचिकाकर्ताओं के वकील ने पैरवी करते हुए तर्क दिया कि प्राप्त की गई राशि वैध पेशेवर फीस थी। पुलिस ने कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना खातों को फ्रीज करने की कार्रवाई की है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह भी तर्क दिया कि पूरे खाते फ्रीज होने के कारण वे अपने दैनिक घरेलू खर्च, कर्मचारियों का वेतन, कर्ज की किश्तें, व्यापारिक प्रतिबद्धताएं और चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरतों का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उनका आर्थिक जीवन रुक गया है।

न्यायालय का कड़ा रुख और मौलिक अधिकार

रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने पाया कि मामले में कथित विवादित राशि लगभग 30 करोड़ रुपए है तथा किसी खाते और संज्ञेय अपराध के बीच प्रथम दृष्टया सीधा संबंध स्थापित किए बिना उसे मैकेनिकल तरीके से फ्रीज करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1) (जी) (व्यापार करने की स्वतंत्रता) के तहत मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि "बैंक खाते के संचालन पर रोक लगाना एक असाधारण उपाय है, जिसे बहुत कम मामलों में, अत्यंत सावधानी के साथ और विधि में निहित सभी सुरक्षा उपायों के अनुरूप ही अपनाया जाना चाहिए।" कोर्ट ने आगे कहा कि जीवन या स्वतंत्रता से वंचित करने वाली प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए, मनमानी नहीं। "आज के समय में बैंक खाता केवल पैसे रखने की जगह नहीं, बल्कि व्यक्ति के आर्थिक अस्तित्व का रक्तप्रवाह है।"

खातों को डी-फ्रीज करने के निर्देश

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया कि जांच एजेंसी द्वारा पहचानी गई 30 करोड़ रुपए की विवादित राशि ही रोक के अधीन रहेगी तथा इसके अलावा खाते बिना किसी बाधा के सभी वैध लेनदेन के लिए पूरी तरह से चालू रहने चाहिए। कोर्ट ने बैंकों को निर्देश दिया कि केवल विवादित राशि की सीमा तक ही निकासी संचालन पर रोक रहे। कोर्ट ने भूपालपुरा के एसएचओ को निर्देश दिया कि वे बिना किसी देरी के इस आदेश की प्रति संबंधित बैंक अधिकारियों को भेजें। साथ ही कोर्ट ने एचडीएफसी लोखंडवाला सर्कल शाखा और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक अंधेरी वेस्ट शाखा को निर्देश दिया कि वे बिना किसी तकनीकी अड़चन के याचिकाकर्ताओं के दो-दो खातों को तुरंत डी-फ्रीज करें।

Pratahkal Bureau

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