नेपाल की तबाही से चेतावनी: प्रकृति में विकृति नहीं, संस्कृति लाएं, सह-अस्तित्व जरूरी
नेपाल की भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति के साथ बढ़ते हस्तक्षेप की गंभीर चेतावनी हैं। जंगलों की कटाई, अनियोजित निर्माण, जलवायु परिवर्तन और नदियों के प्रदूषण से बढ़ते खतरे के बीच सह-अस्तित्व जरूरी है।

तस्वीर में पत्रकार पारस जैन नजर आ रहे हैं।
नेपाल में सामने आई भीषण बाढ़ और उससे जुड़ी आपदाओं ने प्रकृति के साथ मानव के बढ़ते हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में सामने आए तबाही के दृश्य पूरी मानवता को झकझोरने वाले हैं। यह त्रासदी केवल एक देश की समस्या नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन के साथ खिलवाड़ के संभावित परिणामों की चेतावनी भी है।
प्रकृति मनुष्य की मां है। वह हवा, पानी, भोजन, छाया और जीवन के लिए आवश्यक अनगिनत संसाधन उपलब्ध कराती है। लेकिन जब मनुष्य अपने स्वार्थ और लोभ में प्रकृति के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ करता है, तो उसका संतुलन बिगड़ता है और इसका परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ सकता है।
इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब मानव ने प्रकृति की सीमाओं और उसके प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़छाड़ की है, तब-तब प्रकृति ने अपना विकराल रूप दिखाया है। नेपाल की भीषण बाढ़ और उससे जुड़ी आपदाओं के दृश्य इसी खतरे की ओर संकेत करते हैं। यदि प्रकृति के संकेतों को समझने के बजाय उसके साथ छेड़छाड़ जारी रही, तो आने वाले समय में ऐसी परिस्थितियां अन्य क्षेत्रों के सामने भी खड़ी हो सकती हैं।
भूस्खलन, बादल फटना, अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी घटनाओं में लगातार वृद्धि चिंता का विषय है। यह समझना जरूरी है कि प्रकृति के साथ संघर्ष करके मानव कभी विजयी नहीं हो सकता।
नेपाल हिमालय की गोद में बसा देश है और यहां की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद संवेदनशील हैं। पहाड़, जंगल, नदियां और ग्लेशियर वहां के प्राकृतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में विकास कार्यों के दौरान प्रकृति की क्षमता और सीमाओं का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
पहाड़ों की मजबूती केवल चट्टानों पर निर्भर नहीं होती। जंगल और पेड़ पहाड़ी क्षेत्रों को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं और बारिश के पानी के बहाव को नियंत्रित करती हैं। बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाने पर मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। तेज बारिश के दौरान मिट्टी बहने लगती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
इमारती लकड़ी, खेती, सड़क निर्माण, पर्यटन और अन्य गतिविधियों के लिए होने वाली अनियंत्रित कटाई पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करती है। इसका सीधा असर पहाड़ों और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा पर पड़ता है।
पर्यटन और विकास के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से सड़कें, होटल, रिसॉर्ट, जलविद्युत परियोजनाएं और अन्य निर्माण किए जा रहे हैं। विकास आवश्यक है, लेकिन इसकी योजना बनाते समय प्राकृतिक परिस्थितियों की अनदेखी घातक हो सकती है। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना, भारी मशीनों का अत्यधिक उपयोग और प्राकृतिक जलधाराओं के मार्ग में हस्तक्षेप पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
नदियों और बरसाती नालों के प्राकृतिक रास्तों पर निर्माण होने से पानी के बहाव में बाधा आती है। जब पानी को अपना प्राकृतिक रास्ता नहीं मिलता, तो वह आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ सकता है और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।
हिमालय दुनिया के महत्वपूर्ण जल-स्रोत क्षेत्रों में गिना जाता है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान का प्रभाव हिमालयी ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पानी की झीलें बन सकती हैं। यदि इन झीलों की प्राकृतिक सीमाएं टूटती हैं तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आता है। ऐसी घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
GLOF की स्थिति पहाड़ी गांवों, पुलों, सड़कों और निचले इलाकों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। इसलिए हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की लगातार निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
भारत सहित दक्षिण एशिया की अनेक नदियां हमारी सभ्यता और संस्कृति की आधार रही हैं। गंगा, यमुना और अन्य नदियों को सदियों से जीवनदायिनी माना गया है। लेकिन आज नदियों में प्लास्टिक, सीवेज, औद्योगिक कचरा और अन्य प्रदूषक पहुंच रहे हैं। कई स्थानों पर अतिक्रमण के कारण नदी के प्राकृतिक क्षेत्र भी सिकुड़ते जा रहे हैं।
नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होने पर अत्यधिक बारिश के समय पानी के निकास की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए नदियों को केवल धार्मिक या आर्थिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवित प्राकृतिक तंत्र के रूप में देखना होगा।
नेपाल की परिस्थितियां भारत के कई संवेदनशील क्षेत्रों की याद दिलाती हैं। उत्तराखंड की 2013 की केदारनाथ त्रासदी, हिमाचल प्रदेश में सामने आईं भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं तथा जोशीमठ में भू-धंसाव ने भी विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल खड़ा किया।
राजस्थान के कोटा में चंबल नदी के आसपास भी प्रदूषण और अतिक्रमण जैसी समस्याएं पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाती हैं। इन सभी परिस्थितियों से एक बात स्पष्ट होती है कि प्रकृति की अपनी सीमाएं हैं। जब मानव उन सीमाओं को लगातार पार करता है, तो प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
विकास को रोकना समाधान नहीं है। आवश्यकता विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है। बड़े निर्माण कार्यों से पहले वैज्ञानिक और पारदर्शी पर्यावरणीय समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। पेड़ों की कटाई की स्थिति में प्रभावी क्षतिपूर्ति वनीकरण और पौधों की देखभाल सुनिश्चित की जानी चाहिए।
संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में भारी मशीनों और अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण होना चाहिए। नदियों और प्राकृतिक जलधाराओं के आसपास अतिक्रमण रोकने के लिए सख्त कार्रवाई जरूरी है। नदियों में सीवेज और कचरा जाने से रोकने की ठोस व्यवस्था होनी चाहिए। प्लास्टिक के उपयोग को कम करने के लिए जनभागीदारी बढ़ानी होगी।
स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर दिए जाने चाहिए, ताकि उनकी आजीविका के लिए जंगलों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी भी बढ़ाई जानी चाहिए।
हमें यह भ्रम छोड़ना होगा कि मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है। प्रकृति से लड़कर आज तक कोई नहीं जीता। प्रकृति जीवन देती है, लेकिन जब उसके प्राकृतिक संतुलन को लगातार बिगाड़ा जाता है तो उसका परिणाम मानव समाज को ही भुगतना पड़ता है।
नेपाल की आपदा एक गंभीर संदेश देती है—प्रकृति के साथ जीना सीखिए, प्रकृति को जीतने की कोशिश मत कीजिए। पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं। नदियां केवल पानी की धाराएं नहीं हैं। पहाड़ केवल निर्माण सामग्री नहीं हैं। ग्लेशियर केवल बर्फ के भंडार नहीं हैं। ये सभी हमारे जीवन-तंत्र का हिस्सा हैं।
आज जरूरत विकास की परिभाषा को व्यापक बनाने की है। ऐसा विकास, जिसमें सड़कें और इमारतें भी हों, लेकिन जंगल और नदियां भी सुरक्षित रहें। ऐसा विकास, जिसमें रोजगार भी मिले, लेकिन स्थानीय पर्यावरण नष्ट न हो। ऐसा विकास, जिसमें आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रहें।
यदि आज प्रकृति की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाली पीढ़ियां यह सवाल जरूर करेंगी कि जब प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही थी, तब उसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया।
इसलिए समय की पुकार है—प्रकृति में विकृति नहीं, संस्कृति लाएं। प्रकृति का सम्मान करें, पेड़ों की रक्षा करें, नदियों को स्वच्छ रखें और पहाड़ों की संवेदनशीलता को समझें। क्योंकि प्रकृति सुरक्षित है तो मानव जीवन सुरक्षित है।
— प्रस्तुति —
राष्ट्र गौरव पारस जैन ‘पार्श्वमणि’
पत्रकार, A 191 आर के पुरम कोटा (राजस्थान) 9414764980

Dharnendra Jain( Kherwara)
नाम: धरणेन्द्र जैन
वर्तमान पद: सीनियर रिपोर्टर (प्रातः काल दैनिक, खेरवाड़ा विधानसभा)
कार्यक्षेत्र: खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र (खेरवाड़ा, ऋषभदेव, और नयागांव उपखंड क्षेत्र, जिला उदयपुर, राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, प्रशासन सहित सभी क्षेत्रों की खबरें
अनुभव: 30 वर्ष से अधिक
परिचय
धरणेन्द्र जैन उदयपुर जिले के खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के एक अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातः काल दैनिक' में सीनियर रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वह मुख्य रूप से खेरवाड़ा, ऋषभदेव और नयागांव उपखंड क्षेत्र को कवर करते हैं। धरणेन्द्र जैन राजनीति, क्राइम, स्थानीय प्रशासन सहित क्षेत्र के सभी प्रमुख विषयों पर नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
धरणेन्द्र जैन को पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों (30 वर्ष) से अधिक का व्यापक और लंबा अनुभव है:
- वह साल 1995 से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर कार्यरत हैं।
- उन्होंने वर्ष 1998 से 2018 तक लगातार 20 वर्षों तक 'दैनिक भास्कर' में खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के लिए सीनियर रिपोर्टिंग की है।
- वर्ष 2018 से वह लगातार 'प्रातः काल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र की कमान संभाल रहे हैं।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
