नई दिल्ली में आयोजित कॉन्क्लेव में विधायक प्रत्याशी प्रवीण परमार ने खेरवाड़ा में एमबीसी मुख्यालय की पुनः स्थापना और सेना भर्ती गतिविधियों को शुरू करने की मांग की।

देश की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित 'राष्ट्रीय आदिवासी प्रोफेशनल्स कॉन्क्लेव' में दक्षिण राजस्थान के आदिवासी समाज के हक, हकूक और उनके भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की गूंज सुनाई दी। इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मंच पर मेवाड़ क्षेत्र के भील समाज की ज्वलंत समस्याओं और दीर्घकालिक मांगों को बेहद प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया गया, जिसमें खेरवाड़ा क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने सक्रिय रूप से भाग लेकर स्थानीय समाज की आवाज को बुलंद किया।

कॉन्क्लेव के मुख्य मंच से अपनी बात रखते हुए खेरवाड़ा विधायक प्रत्याशी प्रवीण परमार ने मेवाड़ क्षेत्र के भील समाज की विभिन्न समस्याओं एवं मांगों को पुरजोर तरीके से उठाया। परमार ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आदिवासी युवाओं की असीम ऊर्जा और प्रतिभा को सही दिशा देने तथा उन्हें अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत स्तर पर विशेष प्रावधानों पर गंभीरता से विचार करने की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने ऐतिहासिक मेवाड़ भील कोर (एमबीसी) से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए मांग की कि भील समाज की गहरी भावनाओं और गौरवशाली इतिहास के अनुरूप एमबीसी का मुख्यालय पुनः खेरवाड़ा में ही स्थापित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने खेरवाड़ा क्षेत्र में पूर्व में संचालित होने वाली सेना भर्ती तथा उससे संबंधित अन्य गतिविधियों को भी दोबारा शुरू करने की पुरजोर वकालत की, ताकि स्थानीय युवाओं को रोजगार के साथ-साथ देशसेवा के स्वर्णिम अवसर मिल सकें। प्रवीण परमार ने जमीनी हकीकत को बयां करते हुए स्पष्ट कहा कि दक्षिण राजस्थान का आदिवासी समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासनिक भागीदारी जैसे बुनियादी एवं महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आज भी अनेक गंभीर चुनौतियों से निरंतर संघर्ष कर रहा है।

इसी क्रम में, कार्यक्रम में विशिष्ट रूप से उपस्थित आदिवासी कांग्रेस उदयपुर देहात के जिलाध्यक्ष रवि भावा खेरवाडा ने समाज के बौद्धिक सशक्तिकरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अब वह समय आ चुका है जब आदिवासी समाज को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि शिक्षा, विज्ञान, कानून, प्रशासन, मीडिया और नीति निर्माण जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे समाज के प्रतिभाशाली लोगों के ज्ञान और अनुभव का वास्तविक लाभ पूरे समाज तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि आदिवासी समाज के समग्र विकास की नई और प्रगतिशील दिशा तभी तय हो सकती है, जब समाज का बौद्धिक नेतृत्व और जनसंगठन पूरी एकजुटता के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे।

इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में देश के कोने-कोने से आए आदिवासी बुद्धिजीवियों, समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं, ऊर्जावान विद्यार्थियों एवं विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवरों ने हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने मंच के माध्यम से आदिवासी समाज के सतत विकास, भविष्य के नेतृत्व और उनके संवैधानिक अधिकारों पर अपने-अपने विचार व सुझाव साझा किए, जिससे कार्यक्रम में मंचासीन अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच समाज की उन्नति का एक नया रोडमैप तैयार होता दिखाई दिया।

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