मावली: आस्था का सैलाब! लदानी ताकाश्याम में उमड़ा भक्तों का हुजूम, बसंत पंचमी पर पूरी हुई मनौतियां
मावली के लदानी ताकाश्याम मंदिर में बसंत पंचमी व षष्ठी पर उमड़ी भक्तों की भारी भीड़। भेरू सिंह व हरि सिंह सोलंकी के सानिध्य में आयोजित मेले में राजस्थान समेत कई राज्यों से पहुंचे श्रद्धालु। महाभारत कालीन तक्षक नाग (ताकाश्याम) के दर्शन और बासनी कला मंडली के भजनों ने बांधा समां। मन्नतें पूरी होने पर भक्तों ने चढ़ाई प्रसादी।

मावली (उदयपुर)। मेवाड़ की पावन धरा पर आस्था और विश्वास का एक ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने आधुनिकता के दौर में भी प्राचीन परंपराओं की जड़ों को और मजबूत कर दिया है। मावली के निकटवर्ती ग्राम लदानी में स्थित प्राचीन श्री ताकाश्याम मंदिर में बसंत पंचमी और षष्ठी के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं का ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि कतारें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। पौराणिक मान्यताओं को समेटे इस धाम पर राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न कोनों से आए भक्तों ने मत्था टेककर सुख-समृद्धि की कामना की।
उदयपुर-चित्तौड़गढ़ फोरलेन पर कपासन मार्ग के समीप स्थित यह मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए भी विख्यात है। मुख्य गांव से लगभग एक किलोमीटर दक्षिण में तालाब की पाल और मंगरी की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर साक्षात देवलोक का आभास कराता है। महाभारत कालीन संदर्भों के अनुसार, नागराज वासुकी के वंशज तक्षक नाग को कलयुग में 'ताकाश्याम' के रूप में पूजा जाता है। मंदिर परिसर में मौजूद रुद्राक्ष, बिल्वपत्र, पारस पीपल, कल्पवृक्ष, वटवृक्ष और आशापाल जैसे पवित्र वृक्ष यहां की दिव्यता को और बढ़ाते हैं, जिनके दर्शन मात्र से भक्तों की व्याधियां दूर होने की मान्यता है।
इस वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर आयोजन की भव्यता देखते ही बन रही थी। शुक्रवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जो देर रात तक अनवरत जारी रहा। रात्रि जागरण के दौरान बासनी कला की सुप्रसिद्ध भजन मंडली ने सुरों की ऐसी सरिता बहाई कि पूरा परिसर भक्तिमय हो गया। फूलों की महक और रंग-बिरंगी विद्युत सज्जा से जगमगाता मंदिर परिसर किसी उत्सव सा प्रतीत हो रहा था। श्रद्धालुओं ने न केवल भजनों का आनंद लिया, बल्कि षष्ठी के विशेष दर्शनों का लाभ उठाकर अपनी मन्नतें पूरी होने पर अहोभाग्य व्यक्त किया।
ताकाश्याम के प्रति अटूट श्रद्धा का आलम यह है कि कई भक्त मीलों का सफर नंगे पैर तय कर यहां पहुंचते हैं। मन्नत पूरी होने पर परिवारों द्वारा बच्चों के झडूला (मुंडन) और घोलविंटी जैसे मांगलिक संस्कार संपन्न किए गए। भक्तों ने अपनी श्रद्धा अनुसार नारियल, धूप-अगरबत्ती, फल और अनाज चढ़ाया, जिसे बाद में सभी संभागियों और दर्शनार्थियों के बीच प्रसादी के रूप में वितरित किया गया। कई भामाशाहों ने मंदिर में सराय निर्माण और अन्य संसाधनों के लिए स्वेच्छा से दान कर अपनी कृतज्ञता प्रकट की।
इस प्राचीन परंपरा और व्यवस्थाओं को सुचारू बनाए रखने में सोलंकी परिवार का योगदान सराहनीय रहा है। दशकों से चली आ रही इस सेवा को वर्तमान में भेरू सिंह सोलंकी और हरि सिंह सोलंकी पूरी निष्ठा के साथ संपन्न कर रहे हैं। इस पुनीत कार्य में प्रत्येक शुक्रवार और विशेष आयोजनों पर वासनी कला के केला राम गाडरी का भी विशेष सहयोग रहता है। लदानी ताकाश्याम का यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अटूट आस्था और लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण बन गया है।

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