खेरोदा के जैन स्थानक भवन में चल रहे चातुर्मास के दौरान उप प्रवर्तक गुरुदेव कोमल मुनि ने अध्यात्म के पथ पर ज्ञानी और अज्ञानी के अंतर को स्पष्ट करते हुए आत्म-कल्याण का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि श्रद्धानवान और दिव्यज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु का सच्चा ध्यान अर्जित कर सकता है, जबकि अज्ञानी मनुष्य अज्ञान में लीन रहता है और ध्यान अर्जित नहीं कर सकता।

कोमल मुनि ने कहा कि ज्ञानी पुरुष सर्वदा यही प्रार्थना करते हैं, “हे प्रभु! तुम मुझे अपनी शरण और पनाह में ले लो।” उनके मन में यही लौ और लगन बनी रहती है कि प्रभु उन्हें अपने दिल में बसा लें।



पूज्य मुनि श्री ने संसार को नश्वर बताते हुए कहा कि धन-दौलत यानी लक्ष्मी आए या जाए, इसकी एक पल की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। वीतराग परमात्मा और पंच परमेष्ठी के मार्ग पर चलने वाले अनुयायियों को सांसारिक लक्ष्मी के मोह से दूर रहना चाहिए और कभी भी पर-द्रव्य से स्नेह नहीं जोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य स्वयं को स्वयं से नहीं मिलाता, तब तक आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। जो व्यक्ति स्वयं पर ध्यान देना शुरू कर देता है, लक्ष्मी उसके पीछे-पीछे स्वयं चली आती है। सम्यग्दृष्टि जीव का जीवन अत्यंत अद्भुत होता है।

इसी प्रसंग में अध्ययनशील सेवा रत्न हर्षित मुनि जी ने 25 क्रियाओं का परिचय देते हुए श्रावक-श्राविकाओं के 21 गुणों के विषय में विस्तार से अपनी प्रस्तुति दी।

यह जानकारी वर्द्धमान जैन श्रावक संघ अध्यक्ष सुनील कूकड़ा ने दी। कार्यक्रम से संबंधित फोटो बुद्धि प्रकाश पाराशर खेरोदा द्वारा उपलब्ध कराई गई।

Pratahkal Newsroom

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