गोवर्धन पूजा: अहंकार त्याग और प्रकृति संरक्षण का पावन संदेश देती है श्रीकृष्ण की लीला
खेरवाड़ा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान अंकित महाराज ने गोवर्धन पूजा के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। क्या आप जानते हैं कि क्यों श्रीकृष्ण ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा कराई? जानिए अहंकार त्याग और प्रकृति संरक्षण का यह अनूठा संदेश।

खेरवाड़ा के टांक कलेक्शन में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन गोवर्धन पूजा प्रसंग का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने छप्पन भोग अर्पित किए।
खेरवाड़ा के पुराना बस स्टैंड स्थित टांक कलेक्शन के विशाल सभागार में आयोजित पुरुषोत्तम मास की श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन आध्यात्मिक उत्साह का संचार हुआ। वृंदावन के प्रख्यात कथा वाचक श्री अंकित जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की मनोहारी लीलाओं का वर्णन करते हुए गोवर्धन पूजा के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय महत्व पर व्यापक प्रकाश डाला। महाराज श्री ने अपने प्रवचन में स्पष्ट किया कि गोवर्धन पूजा केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि यह अहंकार के त्याग, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामूहिक एकता का एक जीवंत संदेश है।
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार से लेकर विभिन्न लीलाओं का भावपूर्ण चित्रण किया गया। इसमें तृणावर्त वध, मिट्टी खाने की बाल लीला, कालियानाग दमन, अघासुर-बकासुर वध, और राधारानी को मनाने के लिए मनिहारी का रूप धारण करने जैसी प्रसंगों ने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाराज श्री ने दामोदर लीला का मार्मिक वर्णन करते हुए बताया कि जब यशोदा माता ने बाल कृष्ण को ओखली से बांधने का प्रयास किया, तो रस्सी हर बार दो अंगुल कम पड़ जाती थी, जिससे यह सिद्ध हुआ कि प्रभु को केवल प्रेम के बंधन से ही बांधा जा सकता है।
कथा के प्रवक्ता जगदीश व्यास ने इस आध्यात्मिक प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भगवान शिव और श्रीकृष्ण का संबंध अत्यंत आत्मीय है। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात स्वयं भगवान शिव साधु का वेश धारण कर उनके दर्शन हेतु नंद भवन पहुंचे थे। उन्होंने तुलसी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जहां तुलसी का वन है, वही वास्तविक वृंदावन है। गोवर्धन पूजा प्रसंग का उल्लेख करते हुए महाराज श्री ने बताया कि जब भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का मार्ग दिखाया, तो इंद्र के क्रोध के प्रतिकार स्वरूप कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर जनसमूह की रक्षा की। यह लीला आज भी मनुष्य को प्रकृति संरक्षण और विपत्ति के समय एक जुट रहने की प्रेरणा देती है।
कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने गोबर से निर्मित भव्य गोवर्धन पर्वत की पूजा-अर्चना और परिक्रमा की। इस दौरान छप्पन भोग अर्पित कर महाआरती की गई और भक्तों में महाप्रसाद का वितरण हुआ। इस अवसर पर विनय, सुमन, मुकेश, संगीता, करुणा, राजकुमार, मोना देवी, तारा देवी, पुष्पेंद्र, प्रकाश चंद्र, भंवरलाल, शंकरलाल, राजेंद्र कुमार, ओमप्रकाश और लक्ष्मी सरपंच सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र बना, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रतीक भी सिद्ध हुआ।

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