नगर के प्रसिद्ध राम मंदिर में चल रही दिव्य राम कथा के छठे दिन का वातावरण भगवान श्रीराम के अलौकिक प्रताप से ओतप्रोत हो गया। मध्यप्रदेश के सुप्रसिद्ध कथा वाचक वीरेंद्र शास्त्री ने व्यासपीठ से पुष्प वाटिका, गौरी पूजन एवं राम-जानकी मिलन के भावपूर्ण प्रसंग का वर्णन किया। कथा प्रवक्ता जगदीश व्यास के अनुसार, गुरु विश्वामित्र की पूजा हेतु सामग्री लेने पहुंचे भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के दिव्य स्वरूप का दर्शन करते ही माता जानकी ने मन ही मन श्रीराम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था, जब वे अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए वाटिका पहुंचीं।

कथा का प्रवाह आगे बढ़ाते हुए शास्त्री ने बताया कि राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर हेतु शिव धनुष भंग करने की शर्त रखी थी, क्योंकि बाल्यकाल में सीता जी ने सहज ही उस धनुष को उठाकर उसके नीचे सफाई की थी। स्वयंवर सभा में उपस्थित रावण और सहस्त्रबाहु जैसे पराक्रमी योद्धाओं के असफल होने और राजा जनक की निराशा के उपरांत, गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान श्रीराम ने शिव धनुष को प्रणाम कर पलभर में उसे खंडित कर दिया। तत्पश्चात माता सीता ने सखियों के साथ उपस्थित होकर भगवान श्रीराम को जयमाला पहनाई, जिससे संपूर्ण सभा में उल्लास छा गया और श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कथा के दौरान भजन-कीर्तन एवं नृत्य की मनोहारी प्रस्तुतियां दी गईं। कार्यक्रम के अंत में हीरालाल पंचाल, रणछोड़ व्यास एवं महिला श्रद्धालुओं द्वारा चरण धोक की रस्म संपन्न की गई, जिसके उपरांत महाआरती और महाप्रसाद वितरण के साथ कथा का विसर्जन हुआ।

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