नयागांव के ग्रामीण सेवा शिविर में सुलझी किसान की दशकों पुरानी राजस्व समस्या
नयागांव के ग्रामीण सेवा शिविर में वर्षों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे एक बेबस किसान को कैसे मिला अपनी ही जमीन का हक? जानिए राजस्व रिकॉर्ड की उस एक बड़ी गलती और प्रशासनिक न्याय की इस बेहद भावुक कर देने वाली पूरी कहानी को।

खेरवाड़ा। प्रशासनिक संवेदनशीलता और तत्परता जब धरातल पर उतरती है, तो वर्षों से व्यवस्था की भूलभुलैया में भटके आमजन को पल भर में नया जीवन मिल जाता है। कुछ ऐसा ही अनूठा और प्रेरणादायक नजारा राजस्थान सरकार के ग्रामीण सेवा शिविर के दौरान ग्राम पंचायत नगर में देखने को मिला। यहाँ एक पीड़ित किसान के जीवन से दशकों पुराना अंधकार उस वक्त छट गया, जब अधिकारियों ने तत्परता दिखाते हुए उनके राजस्व रिकॉर्ड की जटिल तकनीकी खामी को मौके पर ही दुरुस्त कर दिया। प्रशासनिक न्याय की यह कहानी कागजी दावों से इतर सुशासन के वास्तविक स्वरूप को बयां करती है।
इस विशेष ग्रामीण सेवा शिविर के दौरान आमजन की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए शासन के २२ विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी एक ही छत के नीचे उपस्थित रहे। शिविर में उपखंड अधिकारी सुश्री शिवन्या गुप्ता, विकास अधिकारी चंदूलाल मीणा, तहसीलदार हिम्मतराम पटेल, राजस्व निरीक्षक अजय भील, कार्यक्रम अधिकारी शुशीला भील, ग्राम विकास अधिकारी सुनीता अहारी तथा प्रशासक आशा देवी सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने मोर्चे संभाले। इसके साथ ही पूर्व महामंत्री साकार चंद लबाना, मंडल अध्यक्ष दुर्गा भगोरा एवं प्रतिनिधि भरत तिरगर भी ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान हेतु उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर उपस्थित रहे। जनहित को समर्पित इस शिविर में जहां सैकड़ों मामलों की सुनवाई हुई, वहीं मौके पर ही दो आबादी पट्टे भी वितरित कर ग्रामीणों को उनकी संपत्ति का मालिकाना हक सौंपा गया।
शिविर की सबसे बड़ी सफलता की कहानी आदिवासी बहुल उपखंड क्षेत्र नयागांव की ग्राम पंचायत नगर के रहने वाले किसान जोरावर सिंह से जुड़ी है। जोरावर सिंह वर्षों से राजस्व रिकॉर्ड में हुई एक मामूली लिपिकीय त्रुटि का दंश झेल रहे थे। उनकी पैतृक भूमि की जमाबंदी में उनका नाम 'जोध सिंह पिता नान सिंह' दर्ज हो गया था, जबकि उनके पहचान पत्रों में उनका वास्तविक नाम 'जोरावर सिंह पिता नाना' अंकित था। इस एक छोटी सी त्रुटि के कारण वे तकनीकी रूप से अपनी ही जमीन पर अधिकार साबित करने के लिए मोहताज हो गए थे। हालत यह थी कि इस गड़बड़ी की वजह से उन्हें न तो खेती के लिए कृषि ऋण मिल पा रहा था और न ही वे किसी सरकारी योजना का लाभ उठा पा रहे थे। अपनी इस व्यथा को लेकर वे सालों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे।
जब जोरावर सिंह ने हिम्मत जुटाकर शिविर में उपखंड अधिकारी सुश्री शिवन्या गुप्ता एवं तहसीलदार हिम्मतराम पटेल के समक्ष अपनी इस गंभीर समस्या को रखा, तो प्रशासन ने तुरंत हरकत में आते हुए संवेदनशीलता दिखाई। मामले की गंभीरता को भांपते हुए उपखंड अधिकारी ने गिरदावर एवं पटवारी को तत्काल मौके पर ही रिकॉर्ड की सघन जांच करने के निर्देश दिए। अधिकारियों के निर्देश पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पहचान पत्रों का मिलान किया गया और ग्रामीणों के बयानों का भौतिक सत्यापन कर नियमानुसार नाम शुद्धिकरण की विधिक प्रक्रिया को चंद घंटों में पूरा कर लिया गया।
बरसों की कानूनी पेचीदगी का अंत करते हुए शिविर में ही किसान जोरावर सिंह को उनके सही नाम के साथ डिजिटल जमाबंदी की नई नकल सौंप दी गई। अपने नाम का शुद्ध दस्तावेज हाथों में लेते ही वृद्ध किसान के चेहरे पर छाई मायूसी गहरी खुशी में बदल गई। उन्होंने वागड़ी भाषा में भावुक होते हुए अधिकारियों का आभार जताया और कहा, “अब मारू सही नाम कागज में आवी गियू है, तमारु खूब-खूब आभार।” ग्रामीण सेवा शिविर में हुआ यह त्वरित समाधान केवल एक कागजी सुधार नहीं है, बल्कि यह प्रशासन की जनहितकारी कार्यशैली और आमजन को तुरंत राहत पहुंचाने की दृढ़ प्रतिबद्धता का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है। कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने लाभार्थी को गरिमापूर्ण तरीके से समाधान पत्र प्रदान किया।

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