भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के पन्नों में 25 जून 1975 का दिन एक ऐसे स्याह अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे राष्ट्र कभी विस्मृत नहीं कर सकता। तत्कालीन सरकार द्वारा थोपा गया आपातकाल न केवल संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन का प्रतीक बना, बल्कि उसने देश की राष्ट्रीय चेतना को भी गहरे घाव दिए थे। इसी ऐतिहासिक घटना के स्मरण और लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने के उद्देश्य से खेरवाड़ा के विद्यानिकेतन माध्यमिक विद्यालय सभागार में भाजपा द्वारा एक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसे 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए क्षेत्र के पूर्व विधायक नानालाल अहारी ने कहा कि वर्ष 1975 में राजनीतिक स्वार्थ के लिए लागू किया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक अमिट कलंक के समान है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह दिन हमें उन विषम परिस्थितियों का स्मरण कराता है, जब सत्ता के गलियारों से संविधान की गरिमा को कुचला गया था। साथ ही, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह दिवस देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक मूल्यों का सजग प्रहरी बने रहने के लिए प्रेरित और संकल्पित करता है।

गोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं वरिष्ठ भाजपा नेता पारस जैन ने ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल का निर्णय संवैधानिक भावना के विरुद्ध एक तानाशाही कदम था। उन्होंने घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए बताया कि आपातकाल के बीज उस समय स्पष्ट दिखने लगे थे जब 19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपने चुनाव से संबंधित मामले में गवाही देने वाली पहली भारतीय प्रधानमंत्री बनी थीं। जैन ने केंद्र सरकार द्वारा 11 जुलाई 2024 को जारी गजट अधिसूचना का उल्लेख करते हुए बताया कि अब प्रतिवर्ष 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। यह दिवस उन सभी लोकतंत्र सेनानियों के त्याग और संघर्ष को नमन करने का अवसर है, जिन्होंने आपातकाल के दमनकारी दौर में भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद रखी थी।

इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम में पूर्व प्रधान अमृतलाल डामोर, समाजसेवी विमल कोठारी, अमृतलाल पांचाल, भाजपा मंडल महामंत्री विक्रांत कोठारी एवं भूपेंद्र कलाल, मंडल कोषाध्यक्ष नरेश अग्रवाल और शिक्षाविद नवनीत श्रीमाली सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन विक्रांत कोठारी द्वारा किया गया, जबकि भूपेंद्र कलाल ने उपस्थित सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। यह आयोजन न केवल इतिहास के पन्नों को पलटने का माध्यम बना, बल्कि नई पीढ़ी को संविधान की सर्वोच्चता और लोकतंत्र के महत्व को समझने का संदेश भी देकर गया।

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